राजकीय उद्यानों की जमीन पर निजी निवेश की तैयारी, उद्यान विकास की विरासत पर उठे सवाल।
देहरादून। राज्य के कई राजकीय उद्यानों की बेशकीमती भूमि के कुछ हिस्सों को निजी निवेश के लिए उपयोग किए जाने की चर्चाओं ने उद्यान विकास की ऐतिहासिक विरासत और सरकारी परिसंपत्तियों के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायत प्रतिनिधियों और सोशल मीडिया में सामने आ रही सूचनाओं के अनुसार, कुछ राजकीय उद्यानों की भूमि को हॉस्पिटैलिटी सेक्टर, निजी आवासीय विद्यालय, तीन सितारा होटल और वेलनेस सेंटर जैसी गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है।
उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र कुकसाल का कहना है कि उद्यान विभाग के अनेक राजकीय उद्यानों की भूमि स्थानीय किसानों द्वारा उद्यानिकी गतिविधियों के विकास के उद्देश्य से दान में दी गई थी। उनके अनुसार, ऐसी भूमि का उपयोग उसके मूल उद्देश्य से हटकर किए जाने से पहले इसके ऐतिहासिक और सार्वजनिक महत्व पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। वर्तमान में उद्यान विभाग के विभिन्न जनपदों में 93 राजकीय उद्यान बताए जाते हैं।
चौबटिया से शुरू हुई उत्तराखंड की उद्यान विकास यात्रा
उत्तराखंड में आधुनिक उद्यान विकास का इतिहास रानीखेत के चौबटिया गार्डन से जुड़ा है। करीब 235 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस उद्यान की स्थापना 1860 में हुई और 1869 में इसे विधिवत उद्यान का स्वरूप मिला। यहां सेब, नाशपाती, खुबानी, प्लम, चेरी और हेज़लनट जैसे शीतोष्ण फलों की पौध तैयार करने का काम शुरू हुआ।
वर्ष 1932 में चौबटिया में पर्वतीय फल शोध केंद्र स्थापित किया गया। यहां फल उत्पादन, पौध प्रवर्धन, मृदा प्रबंधन, सिंचाई, कटाई-छंटाई और कीट-रोग नियंत्रण जैसे विषयों पर शोध और प्रशिक्षण हुआ। बताया जाता है कि यहां तैयार पौध सामग्री देश के विभिन्न पर्वतीय राज्यों के साथ नेपाल, भूटान और अफगानिस्तान तक पहुंची।
वर्ष 1953 में पंडित गोविंद बल्लभ पंत के प्रयासों से रानीखेत में फल उपयोग विभाग, उत्तर प्रदेश के निदेशालय की स्थापना हुई। इसके बाद प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में उद्यानिकी को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रजनन उद्यान, राजकीय उद्यान और आलू बीज उत्पादन फार्म स्थापित किए गए।
बंद होते उद्यानों पर चिंता
डॉ. कुकसाल के अनुसार, एक समय उत्तराखंड का उद्यान विभाग फल पौध, सब्जी बीज और आलू बीज उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। कई राजकीय उद्यान, आलू फार्म और शोध केंद्र वर्तमान में बंद हो चुके हैं या उनकी गतिविधियां सीमित हो गई हैं।
उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी जोत, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और पलायन की चुनौती के बीच राजकीय उद्यान किसानों के लिए पौध सामग्री, प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, बीज उत्पादन और रोजगार का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि उद्यान विभाग की भूमि का व्यावसायिक उपयोग किया जाना है तो उसके औचित्य, पारदर्शिता और दीर्घकालिक प्रभाव पर सार्वजनिक विमर्श आवश्यक है। उनके अनुसार, कई पीढ़ियों के प्रयासों से विकसित इन परिसंपत्तियों को मजबूत करने के बजाय उनके मूल उद्देश्य से हटाना भविष्य में गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
सवाल यह है कि उद्यान विकास की जिन आधारशिलाओं को पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने कठिन परिस्थितियों में खड़ा किया, उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए किस रूप में संरक्षित और विकसित किया जाएगा।


