रुद्रप्रयाग में फिर जीवंत हुई मालू के पत्तों से दोने-पत्तल बनाने की परंपरा।
रुद्रप्रयाग। देवभूमि उत्तराखंड अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाजों और लोक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। बदलते परिवेश और आधुनिक जीवनशैली के कारण पहाड़ों की कई पारंपरिक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। इन्हीं परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में रुद्रप्रयाग के कोठगी-भटवाड़ी गांव में मालू के पत्तों से दोने-पत्तल बनाने की पहल शुरू की गई है।
अगस्त्यमुनि विकासखंड के कोठगी-भटवाड़ी गांव में शिक्षक एवं पर्यावरण प्रेमी सत्येंद्र भंडारी के घर से इस पारंपरिक पहल की शुरुआत हुई। ग्रामीणों ने जंगल से मालू के पत्ते एकत्र कर घर के आंगन में बैठकर शादी-विवाह और अन्य शुभ-मांगलिक कार्यों में भोजन परोसने के लिए पारंपरिक दोने-पत्तल और पुड़खे तैयार किए।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में मांगलिक आयोजनों में प्लास्टिक से बने डिस्पोजल दोने-पत्तलों का अधिक इस्तेमाल हो रहा है, जिससे प्लास्टिक कचरे की समस्या बढ़ रही है। ऐसे में मालू के पत्तों से तैयार दोने-पत्तल पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बनने के साथ पहाड़ की पारंपरिक संस्कृति को भी जीवित रख सकते हैं।
मालू के पत्तों से दोने-पत्तल बनाने की परंपरा को व्यापक स्तर पर बढ़ावा मिलने से ग्रामीणों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। शिक्षक सत्येंद्र भंडारी और ग्रामीणों की यह पहल विलुप्त होती लोक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
इस अवसर पर रघुवीर सिंह चौहान, भीम सिंह जगवाण, मानवेंद्र सिंह नेगी, पूर्ण सिंह चौहान, विक्रम सिंह रौतेला, भरत सिंह जगवाण, योगम्बर सिंह मिंगवाल, दिगंबर सिंह मिंगवाल, आनंद सिंह रौथाण, विक्रम सिंह भंडारी, अमीषा बिष्ट, सुनील भंडारी, वैशाख सिंह, अनीता देवी भंडारी, रामेश्वरी देवी, उर्मिला देवी, मथुरा देवी, राजेश्वरी देवी और अजय आनंद नेगी सहित अन्य ग्रामीण मौजूद रहे।



