पहाड़ की समस्याएं वहीं, राजनीति जंगली जानवर, पलायन और बदहाल स्कूलों के बीच विकास की प्राथमिकता पर सवाल।
संपादकीय | हिमालय की आवाज
उत्तराखंड के पहाड़ों में समस्याएं नई नहीं हैं, लेकिन चिंता यह है कि वर्षों से मौजूद समस्याओं के समाधान की गति आज भी सवालों के घेरे में है। चुनाव आते ही सड़क, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती के मुद्दे राजनीतिक भाषणों का हिस्सा बनते हैं, मगर चुनाव के बाद इन समस्याओं की प्राथमिकता अक्सर बदल जाती है। रुद्रप्रयाग के पर्वतीय गांवों की स्थिति इसका उदाहरण है। जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक से खेतों को नुकसान हो रहा है और खेती छोड़ने की मजबूरी बढ़ रही है। खेत और जंगल के बीच सबसे अधिक जिम्मेदारी उठाने वाली पहाड़ की महिलाओं के लिए यह समस्या अब आर्थिक नुकसान के साथ सुरक्षा का सवाल भी बनती जा रही है। 2025 में रुद्रप्रयाग जनपद में 3 महिलाओं की गुलदार के हमले में मौत और जखोली में 11 लोग गुलदार के हमले से घायल हुए थे वही दूसरी तरफ भालू के हमले से बांगर पट्टी में 3 महिलाएं घायल, उच्छना ओर धनकुराली गावँ में गोशालाएं तोड़कर दुधारू पशुओं को घायल करने की घटनाएं आम जनमानस को विचलित करने वाली रही।
वही लिस्वालटा गावँ जो सब्जी उत्पादन के लिए अग्रणी था उसकी तीन तोकों में खेती बजंर हो गयी है जनपद रुद्रप्रयाग की 336 ग्राम पंचायतें जिसमे विकासखण्ड जखोली की 108, अग्सत्यमुनि की 159 व उखीमठ की 69 ग्राम पंचायतों में देखें तो लगभग सभी गांवों में जंगलीं जानवरों के कारण खेती का बहुत बड़ा रकबा बजंर भूमि में बदला है ऐसे में विकास योजनाओं में खेती को जंगली जानवरों से बचाने के लिए मजबूत घेरबाड़ को प्राथमिकता क्यों नहीं मिलनी चाहिए? सवाल यह भी है कि जब गांवों में खेती बचाने की चुनौती सामने हो, तब विकास योजनाओं में बार-बार प्रतीक्षालय और सीसी मार्ग जैसी संरचनाओं को प्राथमिकता देना कितना संतुलित है? सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन सीमित बजट में प्राथमिकता तय करना भी सरकार और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। यदि घेरबाड़ से खेत बचते हैं, उत्पादन बढ़ता है और ग्रामीणों की आजीविका सुरक्षित होती है, तो ऐसी योजनाओं में इसका हिस्सा बढ़ाने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। दूसरी बड़ी चिंता शिक्षा को लेकर है। रुद्रप्रयाग के कई सरकारी विद्यालय भवनों की दयनीय स्थिति और कुछ विद्यालयों के D श्रेणी में जिसे हिमालय की आवाज़ न्यूज पोर्टल ने
रुद्रप्रयाग में 35 सरकारी स्कूल डी श्रेणी में। जर्जर भवनों से बच्चों की सुरक्षा पर सवाल। शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी।
भवनों की मरम्मत और पुनर्निर्माण की चुनौती कितनी गंभीर है। बजट की उपलब्धता का इंतजार करते-करते यदि C श्रेणी के भवन भी D श्रेणी में पहुंचने लगें, तो यह केवल भवन का सवाल नहीं, बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार का प्रश्न है। यह भी स्वीकार करना होगा कि शिक्षण व्यवस्था में सरकार की ओर से कई सकारात्मक प्रयास हुए हैं और सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की कोशिशें लगातार जारी हैं। लेकिन अच्छे शिक्षक और बेहतर शिक्षण तभी प्रभावी होंगे, जब बच्चों को सुरक्षित और सम्मानजनक विद्यालय भवन भी मिलें। दूसरी ओर पलायन के कारण गांवों में छात्र संख्या घट रही है और इसका सीधा असर सरकारी विद्यालयों पर पड़ रहा है, जबकि निजी विद्यालयों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ रहा है। यह स्थिति केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं, बल्कि गांव के भविष्य का संकेत है। यदि खेत खाली होंगे, रोजगार नहीं होगा, युवा बाहर जाएंगे और विद्यालयों में बच्चे कम होंगे, तो पहाड़ के गांवों का सामाजिक ढांचा कैसे बचेगा? इसलिए सरकार को योजनाओं और बजट की प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करना होगा। पहाड़ को प्रतीक्षालय और सीसी मार्गों के साथ-साथ खेती बचाने वाली घेरबाड़, सुरक्षित विद्यालय, स्थानीय रोजगार और पलायन रोकने वाली ठोस नीति की जरूरत है। राजनीति जरूरी है, लेकिन राजनीति की सफलता घोषणाओं की संख्या से नहीं, समस्याओं के समाधान से तय होनी चाहिए। पहाड़ को अब ऐसी राजनीति चाहिए जो चुनाव के समय उसके सवालों को याद न करे, बल्कि पांच साल तक उन सवालों के समाधान पर काम करे। क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पहाड़ में विकास कितना हुआ; असली सवाल यह है कि क्या विकास की प्राथमिकताएं पहाड़ के लोगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तय हो रही हैं?


