रुद्रप्रयाग में 35 सरकारी स्कूल डी श्रेणी में। जर्जर भवनों से बच्चों की सुरक्षा पर सवाल।
बरसात के बाद बढ़ी चिंता, जखोली में सबसे अधिक 18 विद्यालय चिह्नित; 30 प्राथमिक और पांच उच्च प्राथमिक विद्यालय शामिल।
रुद्रप्रयाग। जिले के राजकीय विद्यालयों में भवन और आधारभूत सुविधाओं की स्थिति एक बार फिर चिंता का विषय बनकर सामने आई है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले में संचालित 641 राजकीय प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में से 35 विद्यालयों को डी श्रेणी में चिह्नित किया गया है। इन विद्यालयों के भवन अथवा आधारभूत ढांचे में विभिन्न स्तर पर क्षति पाई गई है और इन्हें मरम्मत एवं सुधार की आवश्यकता है। बरसात के मौसम में इन विद्यालयों की स्थिति को लेकर बच्चों की सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है।
विभागीय वर्गीकरण के अनुसार जिले के 641 विद्यालयों में 153 विद्यालय ए श्रेणी, 337 बी श्रेणी, 116 सी श्रेणी और 35 विद्यालय डी श्रेणी में शामिल हैं। डी श्रेणी में शामिल विद्यालयों में 30 प्राथमिक तथा पांच उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। विकासखंडवार आंकड़ों पर नजर डालें तो जखोली विकासखंड में सबसे अधिक 18 विद्यालय डी श्रेणी में चिह्नित हैं। अगस्त्यमुनि में 13 और ऊखीमठ विकासखंड में चार विद्यालय इस श्रेणी में शामिल हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बारिश के दौरान विद्यालय भवनों की स्थिति और अधिक संवेदनशील हो जाती है। छतों से पानी का रिसाव, दीवारों में नमी एवं दरार, फर्श की खराब स्थिति तथा अन्य संरचनात्मक समस्याएं बच्चों और शिक्षकों के लिए परेशानी का कारण बन सकती हैं। ऐसे में डी श्रेणी में शामिल विद्यालयों की समयबद्ध मरम्मत नहीं होने पर बरसात के दौरान सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
सरकार की ओर से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सरकारी विद्यालयों में सुविधाओं के विस्तार के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन विद्यालय भवनों की जर्जर स्थिति के साथ-साथ शिक्षकों की उपलब्धता पर भी समान रूप से ध्यान देने की जरूरत है। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद छात्र संख्या शून्य होने के कारण बड़ी संख्या में सरकारी विद्यालय बंद हुए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2024 तक जिले में भी 53 सरकारी विद्यालय छात्र संख्या शून्य होने के कारण बंद होने की बात सामने आई थी। हालांकि इनमें से कुछ विद्यालय बाद में पुनः संचालित भी हुए हैं।
सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या घटने के पीछे पलायन को प्रमुख कारण बताया जाता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में निजी विद्यालयों की बढ़ती संख्या और उनमें लगातार बढ़ रही छात्र संख्या इस स्थिति पर नए सवाल खड़े करती है। यदि केवल पलायन को सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या और बंदी का कारण माना जाए तो निजी विद्यालयों में हर वर्ष बढ़ रही छात्र संख्या का भी विश्लेषण आवश्यक है। अभिभावक बेहतर भवन, नियमित शिक्षक और सुविधाओं की तलाश में निजी विद्यालयों का रुख कर रहे हैं।
‘हिमालय की आवाज’ न्यूज पोर्टल द्वारा भी जिले के जर्जर विद्यालय भवनों और उनमें सुधार की आवश्यकता को लेकर समय-समय पर खबरें प्रकाशित की जाती रही हैं। विभागीय अधिकारियों के संज्ञान में मामला लाए जाने के बावजूद कई विद्यालयों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। ऐसे में विद्यालय भवनों की मरम्मत के साथ प्राथमिक विद्यालयों में एकल शिक्षक की समस्या दूर करने तथा आवश्यकतानुसार शिक्षक एवं अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था करना जरूरी है।
विभाग की ओर से डी श्रेणी में शामिल विद्यालयों की स्थिति के आधार पर मरम्मत और सुधार कार्य की प्रक्रिया शुरू किए जाने की बात कही गई है। कई विद्यालयों के लिए डीपीआर भी तैयार की गई है। जिला शिक्षा अधिकारी अजय चौधरी के अनुसार डी श्रेणी में 30 प्राथमिक और पांच उच्च प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं। विद्यालयों की वर्तमान स्थिति के आधार पर आवश्यक मरम्मत एवं सुधार कार्य कराए जा रहे हैं और विभागीय स्तर पर प्रक्रिया जारी है।


