रुद्रप्रयाग बनेगी शतावरी की खेती का केंद्र।
बढ़ेगी किसानों की आय, रुकेगा पलायन।
रुद्रप्रयाग : उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने, पलायन पर अंकुश लगाने और स्थानीय संसाधनों के सदुपयोग के लिए शतावरी की व्यावसायिक खेती वरदान साबित होने जा रही है। जनपद में इसके कृषिकरण को बढ़ावा देने के लिए व्यापक स्तर पर पहल शुरू की जा चुकी है, जिससे स्थानीय किसान आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाएंगे।
इस दिशा में 'सोसाइटी फॉर माउंटेन एप्रोप्रियेट रिसोर्स डेवलपमेंट', जखोली को राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा एक विशेष परियोजना स्वीकृत हुई है। इसके तहत अगस्त माह में जनपद में एक लाख से अधिक शतावरी के पौधे निःशुल्क वितरित किए जाएंगे। साथ ही, चयनित गांवों और विद्यालयों में जन-जागरूकता अभियान चलाकर किसानों को इसकी वैज्ञानिक कृषिकरण तकनीकों तथा आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी लाभों की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।
मूल रूप से जंगली प्रजाति के इस पौधे (Asparagus racemosus) की बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार अब इसके व्यावसायिक उत्पादन को प्रोत्साहन दे रही है। लिलिएसी कुल का यह पौधा आयुर्वेद में 'औषधियों की रानी' माना जाता है। इसका उपयोग स्त्रियों एवं दुधारू पशुओं में दुग्ध वृद्धि, बांझपन, जोड़ों के दर्द, मिर्गी और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के साथ-साथ मलेरिया व टाइफाइड जैसी बीमारियों के उपचार में बहुतायत से होता है।
डॉ बी एस मेंगवाल चेयरपर्सन सोसाइटी फार माउंटेन एप्रुपरिएट रिसोर्स डेवलपमेंट जखोली रुद्रप्रयाग ने बताया कि, शतावरी की खेती समुद्र तल से 800 से 1500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों तथा जल निकासी युक्त लाल दोमट मिट्टी में सरलता से की जा सकती है। रोपण के मात्र 12 से 14 महीनों के भीतर इसकी फसल और जड़ें बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं।
रुद्रप्रयाग में शतावरी की व्यावसायिक खेती औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा कर पलायन रोकने में ऐतिहासिक भूमिका निभाएगी।





