पहाड़ की माटी में छिपी है समृद्धि।
7 बीजों से विजयलक्ष्मी ने लिखी पारंपरिक खेती और नवाचार की अनूठी इबारत।
अगस्त्यमुनि (रुद्रप्रयाग): पहाड़ की मिट्टी को पथरीली और अनुपजाऊ मानकर पलायन करने वालों के लिए विकासखंड अगस्त्यमुनि के ग्राम डोभा भोंसाल की विजयलक्ष्मी देवी एक नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। बिना किसी आधुनिक तकनीकी सहायता के, पूरी तरह पारंपरिक तौर-तरीकों को अपनाकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो पहाड़ की माटी भी सोना उगल सकती है।
विजयलक्ष्मी देवी की यह प्रेरक यात्रा महज 7 स्थानीय राजमा के बीजों से शुरू हुई थी। उन्हें गांव की ही एक महिला ने चुनौती भरे अंदाज में यह बीज सौंपते हुए स्थानीय बोली में कहा था— "त्वे सगोर होलु त यूं 7 बीजूंन तु कुठार भर सकदी" (अर्थात, यदि तुझमें सामर्थ्य और सच्ची लगन होगी, तो इन 7 बीजों से ही तू अपना अन्न भंडार भर देगी)। इस चुनौती को स्वीकार कर उन्होंने इन बीजों को रोपा। हालांकि, वन्यजीवों ने दो पौधों को नष्ट कर दिया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। बचे हुए महज 5 पौधों की लगन से देखभाल कर उन्होंने सिर्फ दो वर्षों के भीतर 5 किलोग्राम शुद्ध स्थानीय राजमा की पैदावार कर दिखाई।
राजमा की इस अभूतपूर्व सफलता ने विजयलक्ष्मी का खेती के प्रति रुझान और बढ़ा दिया। उन्होंने न सिर्फ पहाड़ के पारंपरिक अनाजों जैसे गहत, तोर, मंडुआ और झंगोरा का संरक्षण कर रही हैं अपितु कृषि क्षेत्र में नवाचार (इन्नोवेशन) की राह भी पकड़ी। आज जब पहाड़ों से नारंगी विलुप्ति की कगार पर है, तब उन्होंने अपने खेतों में नारंगी के 10 पौधे लहलहाए हैं। इसके साथ ही वे बड़े पैमाने पर अखरोट, विभिन्न फलदार पौधे और जैविक मसालों का सफल उत्पादन भी कर रही हैं।
विजयलक्ष्मी देवी का यह अभिनव प्रयास पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को घाटे का सौदा मानने वालों की आंखें खोलने वाला है। यह समाचार संदेश देता है कि आज के दौर में पारंपरिक बीजों के संरक्षण और थोड़े से कृषि नवाचार के जरिए न सिर्फ विलुप्त होती प्रजातियों को बचाया जा सकता है, बल्कि पहाड़ की आर्थिकी को भी एक नया जीवन दिया जा सकता है। विजयलक्ष्मी आज क्षेत्र की अन्य महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं, जो यह सिखाती हैं कि आत्मनिर्भरता का रास्ता हमारी अपनी माटी से ही होकर गुजरता है।




