आपदा के बाद प्रशासनिक उपेक्षा की मार: पानी के अभाव में मरीं 6 हजार ट्रॉट मछलियां ।
पाई-पाई को मोहताज हुई मत्स्य पालक।
26 जून 2025 को लनगाड़ गदेरे में आई भीषण अतिवृष्टि और मलबे ने ग्राम खाटली किमाणा की महिला काश्तकार मीना देवी की मेहनत पर पानी फेर दिया था। आपदा में उनका मछली तालाब पूरी तरह बह गया था। इस आपदा से उबरते हुए मीना देवी ने हिम्मत नहीं हारी और मत्स्य पालन विभाग के सहयोग से 4 रेसवे और 2 कच्चे तालाब तैयार कर लगभग 8,000 ट्रॉट मछलियों का पालन दोबारा शुरू किया। लेकिन विभागीय लापरवाही ने उनकी आत्मनिर्भरता के सपने को तोड़कर रख दिया।
आपदा में ध्वस्त हुई सिंचाई नहर का निर्माण 'लघु सिंचाई विभाग' द्वारा एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी नहीं कराया गया। तालाबों में पानी के गंभीर संकट को देखते हुए मीना देवी ने खुद ₹19,000 के एचडीपीई (HDPE) पाइप खरीदकर पानी लाने का प्रयास किया, लेकिन यह व्यवस्था नाकाफी साबित हुई। पर्याप्त पानी न मिलने से तालाबों में मछलियां तड़प-तड़पकर मरने लगीं और महज एक सप्ताह के भीतर करीब 6,000 ट्रॉट मछलियों की मौत हो गई।
जब पीड़िता ने मत्स्य पालन विभाग से बीमे की गुहार लगाई, तो उन्हें बताया गया कि विभाग में अभी बीमा प्रक्रिया ही प्रारंभ नहीं हुई है। तहसील दिवस, जनता दरबार और प्रभारी मंत्री तक गुहार लगाने के बावजूद मीना देवी को केवल निराशा हाथ लगी। मीना देवी का कहना है, "मैंने सोचा था कि मछलियों को बेचकर पानी और कर्ज की व्यवस्था करूंगी, लेकिन अब सब खत्म हो गया है।" यह स्थिति सरकार की स्वरोजगार योजनाओं के धरातलीय क्रियान्वयन पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
मामले पर लघु सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता मोहन लाल आर्य ने कहा कि उक्त नहर का निर्माण राज्य योजनान्तर्गत प्रस्तावित किया गया है। जैसे ही बजट का आवंटन होता है, प्राथमिकता के आधार पर नहर का निर्माण तत्काल शुरू करा दिया जाएगा।



