बीटेक के बाद नौकरी नहीं, गांव में शुरू किया स्वरोजगार; दीपक सिंह ने पहाड़ में खड़ी की नई मिसाल

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बीटेक के बाद नौकरी नहीं, गांव में शुरू किया स्वरोजगार; दीपक सिंह ने पहाड़ में खड़ी की मत्स्य, कुक्कुट और केले की नई मिसाल।

रुद्रप्रयाग के जखोली में युवा उद्यमी का अनूठा प्रयोग, 15 मत्स्य तालाबों के साथ मछली बीज उत्पादन, कुक्कुट व मौन पालन के बाद केले की व्यावसायिक खेती पर जोर।

जखोली, रुद्रप्रयाग। उच्च शिक्षा के बाद अच्छी नौकरी की तलाश में शहरों का रुख करने वाले युवाओं के बीच रुद्रप्रयाग के जखोली विकासखंड के डंगवालगांव और तिमली निवासी दीपक सिंह ने स्वरोजगार की ऐसी राह चुनी है, जो पहाड़ के अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। तुलाज इंस्टीट्यूट से बीटेक कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने के बाद दीपक ने नौकरी के पीछे भागने के बजाय गांव लौटकर अपनी शिक्षा और स्थानीय संसाधनों को रोजगार का माध्यम बनाया। आज वह मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन, मौन पालन के साथ पहाड़ में पारंपरिक खेती से हटकर केले की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं।

दीपक सिंह ने बताया कि उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी रोजगार के सीमित अवसरों के कारण बड़ी संख्या में युवा मानसिक दबाव और आर्थिक चुनौतियों से जूझते हैं। कई युवा अच्छी नौकरी नहीं मिलने पर कम आय वाली नौकरियों तक सीमित रह जाते हैं। ऐसे में उन्होंने अपने गांव में उपलब्ध भूमि, पानी और अन्य संसाधनों का उपयोग कर स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाया।

वर्तमान में दीपक के पास 15 मत्स्य तालाब हैं। इसके साथ ही चार स्थानों पर मछली के बीज तैयार करने का कार्य किया जा रहा है। मत्स्य पालन के साथ उन्होंने कुक्कुट पालन और मौन पालन को भी अपने व्यवसाय का हिस्सा बनाया है। उनका प्रयास पहाड़ में खेती को केवल परंपरा तक सीमित रखने के बजाय उसे आधुनिक और लाभकारी व्यवसाय में बदलने का है।

इसी सोच के तहत दीपक ने पहाड़ में केले की खेती का प्रयोग शुरू किया है। उनका कहना है कि केले की फसल के शुरुआती परिणाम उत्साहजनक हैं। यदि स्थानीय किसान वैज्ञानिक तरीके से केले की खेती करें और उसे बाजार से जोड़ा जाए तो यह पहाड़ी क्षेत्रों में किसानों के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत जरिया बन सकती है।

केले की खेती को स्थानीय किसानों तक पहुंचाने के लिए 20 सितंबर को तिमली बड़मा में किसानों की गोष्ठी एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसमें किसानों को केले की खेती की तकनीक, उत्पादन और व्यावसायिक संभावनाओं की जानकारी दी जाएगी। दीपक का उद्देश्य स्थानीय किसानों को पारंपरिक खेती के साथ ऐसी फसलों से जोड़ना है, जिनसे उनकी आमदनी बढ़ सके।

दीपक सिंह का कहना है कि पहाड़ का युवा यदि अपनी शिक्षा, तकनीक और स्थानीय संसाधनों का सही इस्तेमाल करे तो रोजगार के लिए पलायन ही एकमात्र विकल्प नहीं है। गांव में रहकर भी कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में रोजगार और उद्यमिता की नई संभावनाएं तैयार की जा सकती हैं।

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