विश्व पर्यावरण दिवस 2026

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 की थीम क्या है,
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 विकास की अंधी दौड़ में सुलगते पहाड़, क्या आपदाओं से भी सबक नहीं सीखेंगे हम?

अनियंत्रित विकास और अंधाधुंध मानवीय हस्तक्षेप को नहीं रोका गया, तो प्रकृति का यह संहारक रूप पूरी मानव सभ्यता को लील जाएगा।

 आगामी 5 जून को दुनिया भर में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा, जिसकी इस वर्ष (2026) की थीम "क्लाइमेट एक्शन" (#NowForClimate) रखी गई है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का यह वैश्विक अभियान जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और धरती द्वारा दिए जा रहे विनाशकारी संकेतों पर तत्काल कदम उठाने की चेतावनी दे रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि तमाम दावों और सरकारी प्रयासों के बाद भी, भौतिकवाद के इस युग में जब हमारा पर्यावरण ही सुरक्षित नहीं है, तो मानव जीवन कैसे सुरक्षित रहेगा? यह बुनियादी बात आम आदमी की समझ में क्यों नहीं आ रही है?

जब हम 'हरित प्रदेश' की बात करते हैं, तो उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र अपनी प्राकृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है। मगर आज इसी देवभूमि पर कंक्रीट के विशाल जंगल खड़े हो रहे हैं। रुद्रप्रयाग के तिलनी क्षेत्र में नदी किनारे बन रही 11 मंजिला इमारत—जिसकी कुछ मंजिलों को भारी विवाद और सुर्खियों में आने के बाद कम करना पड़ा—इस अनियंत्रित निर्माण का सबसे बड़ा और चिंताजनक उदाहरण है। इसके साथ ही पहाड़ों में अनियंत्रित वाहनों का रेला और लाखों पर्यटकों व तीर्थयात्रियों का एक साथ उमड़ना सीधे तौर पर संवेदनशील हिमालयी पर्यावरण को मरणशैया पर धकेल रहा है।

भूवैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की स्पष्ट चेतावनी है कि चारधाम जैसे अति-संवेदनशील क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप या तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए था, या फिर बेहद सीमित होना चाहिए था। यदि ऐसा होता, तो आज स्थितियां नियंत्रण से बाहर न होतीं।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम हालिया इतिहास की भीषण आपदाओं से भी कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी हो, 'चिपको आंदोलन' की प्रणेता गौरा देवी के गांव रेणी की आपदा हो, या धराली का संकट—इन सभी विनाशकारी घटनाओं की मूल वजह इंसानी लालच ही है। आज हम पहाड़ों के उस 'कैचमेंट एरिया' (जलभराव क्षेत्र) में अपने आशियाने और होटल बना रहे हैं, जो वास्तव में पहाड़ों की प्राकृतिक जल निकासी के मुख्य द्वार हैं। वर्तमान में मयाली बाजार, तिलवाड़ा और विजयनगर बाजार जैसे कई संवेदनशील क्षेत्र इसी मानवीय भूल के कारण भविष्य के बड़े खतरे की जद में आ चुके हैं।

पहाड़ों में पर्यावरण को नुकसान सिर्फ प्लास्टिक या कूड़ा फेंकने तक सीमित नहीं है। जमीनी हकीकत यह है कि आज गांवों के बीच उगी झाड़ियों तक को साफ नहीं किया जा रहा, ऐसे में नए पेड़ लगाना तो बहुत दूर की कौड़ी साबित हो रहा है। इसके अतिरिक्त, जंगलों में दावानल (वनाग्नि) की बढ़ती घटनाएं बेहद डरावनी हैं। इसके पीछे का एक बड़ा कारण यह है कि पिछले 30 वर्षों की तुलना में पहाड़ों में पशुपालन में 80 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। पूर्व में पशुओं की चराई के कारण जंगलों का सूखा पिरुल और घास नियंत्रित रहती थी, जो अब बारूद का काम कर रही है।

भौगोलिक रूप से विषम होने के कारण ही ये पहाड़ और पेड़-पौधे आज तक बचे हुए हैं। पहाड़ और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि समय रहते "क्लाइमेट एक्शन" के तहत इस अनियंत्रित विकास और अंधाधुंध मानवीय हस्तक्षेप को नहीं रोका गया, तो प्रकृति का यह संहारक रूप पूरी मानव सभ्यता को लील जाएगा।

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