पहाड़ की आत्मनिर्भरता की धुरी बनीं महिला कृषि-उद्यमी

अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026,
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अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026: पहाड़ की आत्मनिर्भरता की धुरी बनीं महिला कृषि-उद्यमी।

पारंपरिक ज्ञान से समृद्ध हो रही आजीविका।आने वाला समय 'पहाड़ी उत्पादों' और 'पहाड़ी नारी' की शक्ति का होगा।

श्रीनगर- संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित 'अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026' के वैश्विक अभियान के बीच उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में महिला कृषि-उद्यमिता को एक नई धार मिल रही है। हाल ही में एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी इसी दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुई है। इस आयोजन का मुख्य केंद्र पहाड़ की वह महिला किसान रही, जो एक हाथ से घर-गृहस्थी की कठिन जिम्मेदारियां संभालती है, तो दूसरे हाथ से बंजर होती खेतों की मिट्टी में सोना उगाकर पहाड़ की आर्थिकी को जिंदा रखे हुए है।

पहाड़ में खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि संस्कृति है। संगोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पहाड़ की महिलाओं के पास खेती का जो समृद्ध पारंपरिक ज्ञान है, वह आज के समय में जैविक (Organic) उत्पादों की वैश्विक मांग को पूरा करने में सबसे सक्षम है। गढ़वाल विवि के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने कहा कि यदि हम इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक नवाचार और तकनीक के साथ जोड़ दें, तो उत्तराखंड के उत्पाद 'ग्लोबल ब्रांड' बन सकते हैं। आज जब पूरी दुनिया रसायन मुक्त भोजन की ओर लौट रही है, तब पहाड़ की महिलाओं द्वारा उत्पादित मंडुआ, झंगोरा, दालें और औषधीय उत्पाद उनकी समृद्धि का आधार बन रहे हैं।

पहाड़ में महिला किसानों के लिए राह आसान नहीं है। जंगली जानवरों द्वारा फसल का नुकसान, सिंचाई के साधनों का अभाव और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद महिलाएं डटी हुई हैं। इन समस्याओं के बीच लस्तर हिलाईं फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (FPO) जखोली, आईआरडी फाउंडेशन और उमंग स्वायत्त सहकारिता जैसी संस्थाओं ने महिलाओं को संगठित करने का काम किया है। इस अवसर पर इन संस्थाओं से जुड़ी महिला उद्यमियों को सम्मानित किया गया, जो इस बात का प्रतीक है कि जब महिला किसान समूहों (Self Help Groups) के माध्यम से बाजार तक पहुँचती हैं, तो बिचौलियों का शोषण खत्म होता है और उन्हें अपने पसीने की सही कीमत मिलती है।

संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय से पहुँचे प्रो. एके बागी और प्रो. एके नेगी ने स्पष्ट किया कि महिलाओं को आर्थिक रूप से और अधिक समृद्ध बनाने के लिए उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना अनिवार्य है। संगोष्ठी के दौरान मौल्यार रिसोर्स फाउंडेशन और ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग के बीच हुआ एमओयू (MoU) इसी कड़ी का हिस्सा है, जो महिला किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और बाजार तक सीधी पहुँच सुनिश्चित कराएगा।

सामाजिक कार्यकर्ता ममता पांगती और अन्य विशेषज्ञों ने इस बात पर खुशी जाहिर की कि अब महिलाएं केवल 'मजदूर' नहीं बल्कि 'उद्यमी' के रूप में पहचानी जा रही हैं। डॉ. आरएस नेगी और डॉ. अंकित सती के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026 का असल जश्न तभी सार्थक होगा जब पहाड़ की इन महिलाओं के श्रम को सम्मान मिले और उनके पारंपरिक जैविक ज्ञान को वैज्ञानिक मान्यता के साथ बड़े बाजारों तक पहुँचाया जाए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित महिला किसानों का उत्साह यह बताने के लिए पर्याप्त था कि आने वाला समय 'पहाड़ी उत्पादों' और 'पहाड़ी नारी' की शक्ति का होगा।


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