सम्पादकीय
जय जवान, जय किसान से कृषि सुधार तक—किसान के हित का सवाल आज भी अधूरा।
भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भारतीय राजनीति में सादगी, ईमानदारी और जनसरोकार की मिसाल माने जाते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत केवल उनका व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह दृष्टि थी जिसमें देश की सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ा गया। उनका प्रसिद्ध मंत्र ‘जय जवान, जय किसान’ आज भी भारतीय राष्ट्र-निर्माण की मूल भावना को व्यक्त करता है। प्रधानमंत्री कार्यालय भी शास्त्री जी के इस आह्वान को किसानों और देश के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रतीक मानता है।
शास्त्री जी के दौर में देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। उन्होंने किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित किया और कृषि को राष्ट्रीय प्राथमिकता के केंद्र में रखा। आगे चलकर कृषि उत्पादन बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा मजबूत करने और कृषि बाजार को व्यवस्थित करने की दिशा में कई संस्थागत कदम उठे। उस दौर का मूल संदेश स्पष्ट था—किसान मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा।
आज, छह दशक बाद भी यही सवाल हमारे सामने खड़ा है कि किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य, बाजार की स्वतंत्रता और आर्थिक सुरक्षा कैसे मिले?
इसी संदर्भ में 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को देखना महत्वपूर्ण है। इन कानूनों का घोषित उद्देश्य किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प देना, निजी खरीदारों और अन्य बाजार माध्यमों तक पहुंच बढ़ाना तथा अनुबंध खेती के लिए कानूनी ढांचा उपलब्ध कराना था। सरकार ने इन्हें विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के हित में कृषि सुधार का हिस्सा बताया था।
लेकिन इन कानूनों के खिलाफ बड़े स्तर पर किसान आंदोलन हुआ। किसानों के एक हिस्से ने इनके प्रावधानों को लेकर गंभीर आशंकाएं जताईं। सरकार और किसान संगठनों के बीच लंबे समय तक संवाद और गतिरोध चलता रहा। अंततः 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को कानूनों के लाभ समझाने में सफल नहीं हो सकी।
बाद में संसद ने Farm Laws Repeal Act, 2021 के माध्यम से तीनों कानूनों को निरस्त कर दिया।
What is agricultural reform bill 2020-कृषि सुधार बिल 2020 क्या है
इस पूरे घटनाक्रम को केवल सत्ता या विपक्ष की राजनीति के चश्मे से देखना शायद किसान के वास्तविक प्रश्न को छोटा कर देना होगा। राजनीतिक दबाव, किसान आंदोलन और सरकार की संवाद संबंधी चुनौतियां इस घटनाक्रम का हिस्सा जरूर थीं, लेकिन मूल प्रश्न आज भी वही है—किसान को अपनी उपज का बेहतर मूल्य और बाजार में वास्तविक आर्थिक ताकत कैसे मिले?
शास्त्री जी की विरासत हमें यही सिखाती है कि किसान केवल चुनावी भाषणों का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की आधारशिला है। कृषि सुधार आवश्यक हैं, लेकिन सुधारों की सफलता केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि किसान का विश्वास जीतने, व्यापक संवाद करने और उसकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने से तय होगी।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकारें बदलें या नीतियां बदलें, किसान के हित को लेकर राष्ट्रीय सहमति बनी रहे।
‘जय जवान, जय किसान’ केवल इतिहास का नारा नहीं होना चाहिए; यह कृषि नीति की कसौटी भी बनना चाहिए।


