भारत कृषि प्रधान देश है और भारत के 85 प्रतिशत लोग खेती कार्य से जीविकोपार्जन करते थे। कृषि के क्षेत्र में प्रारम्भिक दो पंचवर्षीय योजनाओं के बाद सरकारों द्वारा विशेष रूप से ध्यान नहीं दिया जिस कारण किसान खेती से विमुख होता गया और वर्तमान समय पर 57.8 प्रतिशत लोग ही खेती किसानी से जुड़े हैं जिनमें से भी 70 प्रतिशत किसानों के पास छोटी जोत हैं। कृषि के क्षेत्र में संसाधनों का अभाव व प्राथमिक व द्वितीयक सुविधाओं की कमी के कारण किसान की अगली पीढ़ी को कृषि कार्यों की अपेक्षा अन्य कार्यों में अपनी जीविकोपार्जन के स्रोत खोजने पर मजबूर होती गयी।
भारत में वर्तमान एनडीए सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं को वर्ष 2017 से बनाना बंद कर दिया है। सोवियत रूस की नकल पर बनायीं जा रहीं पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश की आर्थिक नियोजन प्रणाली को बंद कर दिया गया है और 12वीं पंचवर्षीय योजना भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना कही जाएगी। पंचवर्षीय योजनाओं के स्थान राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था, जिसे नीति आयोग भी कहा जाता है, का गठन 1 जनवरी, 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के द्वारा किया गया । नीति आयोग के द्वारा एक वित्त वर्ष के लक्ष्य तय किये जातें हैं। जिसमें कृषि के क्षेत्र में काम करने वाले किसानों के हित के लिए सरकार द्वारा योजनाओं का संचालन किया गया है।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या उत्पाद का बाजार मूल्य लागत मूल्य से कम मिलना है जिससे छोटा या बड़ा किसान आर्थिक रूप से प्रभावित होता है। भारत सरकार द्वारा किसानों की आय को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार की योजनाओं और सेवाओं को शुरूवात की है । इन योजनाओं के माध्यम से किसानों की आय को बढ़ाया जा सके जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 14 सितंबर, 2020 को लोकसभा में एक नया कृषि सुधार बिल 2020 (Agriculture Reform Bill 2020) प्रस्तुत किया था। जिसे 5 जून, 2020 को अध्यादेश के रूप में विधेयक रखा गया था और लोकसभा में 17 सितंबर 2020 को पारित किया गया। राज्य सभा ने 20 सितंबर 2020 इस विधेयक को पारित कर दिया। जो किसानों की द्वारा उत्पादित फसल, अनाज व अन्य कृषि उत्पाद, फसल मूल्य तथा बाजार मूल्य आदि से जुड़ा हुआ था। इस बिल का मुख्य उद्देश्य कृषि उपज का व्यापार एवं कृषि उपज वाणिज्य को सरलीकरण करना है ।
कृषि सुधार बिल 2020 से पूर्व बने कृषि कानून के अंतर्गत किसान अपनी उपज को तीन तरीकों से विपणन करता था।
1 - स्थानीय बाजार में
2 - MSP में (Maximum support price)
3 - APMC मंडी में (Agricultural Produce Market Committee)
1- स्थानीय बाजार- छोटे किसान जिनके पास छोटी जोत हैं या किसी कारण से फसल का उत्पादन कम होने से किसान ज्यादातर अपनी फसलों को अपने नजदीक जान पहचान के लोगों को बेच देता है। इनमें रिश्तेदार या वो लोग खरीद में ज्यादातर शामिल होतें हैं जो किसान को मदद देते हैं जैसे बिचोलिये और साहूकार। किसान को दुविधा रहती है कि अपने रिश्तेदारों से ज्यादा कीमत कैसे लूँ और बिचौलियों को पता है उत्पाद कम है किसान बाजार जायेगा नहीं बेचने को। कम कीमत पर उत्पाद बेचना किसान की मजबूरी हो जाती है। इस समस्या से किसान को अपनी लागत मूल्य के बराबर भी उत्पाद का मूल्य नहीं मिल पाता है।
2- न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) - इसे MSP या न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम से भी जाना जाता है न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटीड मूल्य है जो किसानों को उनके कृषि उत्पाद या फसल पर लागू होता है। बाजारों में फसलों की कीमत कम या ज्यादा होने का प्रभाव सीधे किसानों पर ना पड़े जिसके लिए भारत सरकार के कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा सन 1966 -67 से किसानों की फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की दर निर्धारित की जाती रही है। इससे किसानों को बड़ी राहत प्रदान होती है क्योंकि बाजार में चल रहे उतार-चढ़ाव को लेकर किसान आर्थिक रूप से समस्या में रहते हैं। इसीलिए किसान द्वारा एमएसपी की मांग सबसे ज्यादा होती है। इसलिए किसानों के द्वारा अपनी उपज को सरकारी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचा जाता है
MSP की पूरी प्रक्रिया FCI के अंतर्गत आती है और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपने उत्पाद को बेचने के लिए लम्बे और अपारदर्शी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है । जिससे किसानों की फसलें FCI के नियमों के आधार पर अधिकतर सही नहीं पायी जाती हैं। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए किसान का अधिक समय लगता है अधिक दिन होने के कारण फसलों के ख़राब होने की संभावना रहती है जो किसान के लिए मजबूरी का कारण बनता है अपनी फसल को मंडी में बेचने के लिए।
3- कृषि उपज बाजार समिति (Agricultural Produce Market Committee) मंडी- कृषि उपज बाजार समिति (Agricultural Produce Market Committee) की स्थापना भारत के सभी राज्यों की राज्य सरकारों द्वारा किसानों को कृषि उपज बेचने के लिए एक मंच देने के लिए की गई थी। किसानों के हित को देखते हुए समितियां यह सुनिश्चित करती है कि किसान लालची बिचौलिये द्वारा किसानों को उनकी कृषि उपज की कम कीमत देकर और बाजार में उन्हें अधिक दाम पर बेचकर किसानों का शोषण न करें। किसानों को सबसे बड़ी समस्या अपने जमा पूंजी लगाकर कृषि कार्य को करने के बाद भी अपने उत्पादों का लाभ कभी नहीं मिला जिससे किसान साहूकार और बिचौलियों के चुंगुल में फसंते हैं। कृषि उपज का दाम लागत मूल्य के बराबर भी न मिलने पर किसान अधिक ऋण लेने के लिए मजबूर होते थे। इस समस्या को देखते हुए कृषि उपज बाजार समितियों द्वारा विभिन्न राज्यों में किसानों की मदद की है।
APMC मंडी में बिचौलियों के द्वारा किसानो की उपज को बेचने के लिए बीच की कड़ी होते हैं। जो खरीद्दार और विक्रेता के बीच सौदा तय करातें हैं । सरल शब्दों में कहें तो ऑनलाइन खरीद करते समय अमेजन कम्पनी के द्वारा खरीददार से मांग लेकर विक्रेता से सम्पर्क कर सामान उपलब्ध करा देती है और इस काम के बीच में खरीददार और विक्रेता का आपस में कोई सम्पर्क नहीं होता ऑनलाइन समान बेचने वाली कम्पनी पारदर्शिता के साथ क्रय-विक्रय का काम करती है। मंडियों में बिचौलियों या दलालों द्वारा भी यही काम किया जाता है। इन्ही बिचौलियों के द्वारा पारदर्शी तरीके से फसल खरीद व बिक्री न करने के कारण किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता है।
उपरोक्त तीन कृषि कानून के नुकसान-
किसानों की उत्पाद विपणन की समस्या का समाधान इन तीनों कानून के लागू होने के प्रारम्भ में ये कानून किसानों के लिए फायदेमंद रहे लेकिन भ्रष्टाचार, मुनाफ़ाखोरी और किसानों का आर्थिक शोषण स्तर अब चरम पर चला गया है। किसान अपनी उपज को स्वयं अपने क्षेत्र से बाहर नहीं बेच सकता है बहुत छोटे किसानों को छोड़कर उन किसानों को जिनके पास उपज की मात्रा अधिक होती है वे APMC मंडी नियम के कारण अपने मंडी से अलावा दुसरे शहरों या जिलों में अपनी फसल नहीं बेच सकता है
आढ़ती या बिचौलिया किसे कहतें हैं - भारत देश के आजाद होने के समय किसान बहुत गरीब स्थिति में थे। किसान किसी न किसी तरह से जमीदारों या साहूकारों पर आश्रित रहते थे। जिसके कारण किसानों का शोषण जमीदारों और साहुकारों द्वारा किसानों की जमीनों को अपने कब्जे में लेकर किया गया और किसानों द्वारा आंदोलन के माध्यम से जमीदारों और साहूकारों के द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों पर कुछ हद तक रोक लगाई गयी।
भारत सरकार द्वारा किसानों की इस समस्या के समाधान के लिए Agricultural Produce Market Committee बिल लेकर आयी जिसे मंडी समिति या बाजार समिति के नाम से जाना जाता है। इन समितियों में खरीददार को ही आढ़ती/व्यापारी या बिचौलिया कहा जाता है। किसान अपनी फसल को स्वयं एक जगह पर नहीं बेच सकता क्योंकि किसान का उत्पाद निश्चित समय में उत्पादित होता है। जिससे खरीददार को ये पता नहीं चलता है की उत्पाद कहां पर उपलब्ध है इसी समस्या के समाधान के लिए सरकार द्वारा बाजार समितियों को निश्चित स्थान पर स्थापित किया गया। जिससे 'किसान अपना उत्पाद लेकर आसानी से मंडी में बैठे व्यापारी को बेच सके और खरीददार को भी एक ही स्थान पर उत्पाद आसानी से मिल सके। बाजार समिति या मण्डी में रहने वाला व्यापारी बाजार भाव से कम कीमत पर उत्पाद को किसान से खरीद करता है और खरीद मूल्य पर आढ़त जोड़कर उस उत्पाद को बेच देता है।
किसानो की इन्ही समस्याओं को देखे हुए भारत सरकार द्वारा तीन कृषि बिलों को संसद के दोनों सदनों से पारित करवाया गया। इन्हीं तीन कृषि सुधार बिलों की वापसी के लिए वर्तमान समय में किसान आंदोलन अपने चरम पर है। आंदोलन क्यों और कैसे की बहस के लिए केंद्र सरकार द्वारा किसान नेताओं के साथ वार्ता की जा रही है। जिसमे 12 बैठकों के बाद भी निष्कर्ष न निकलने के बाद केंद्र सरकार द्वारा माननीय सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर इन तीन कृषि सुधार बिल 2020 को कुछ समय के लिए लागू न करने का फैसला लिया गया है।
किसानों की समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार द्वारा संसद से तीन कृषि विधेयकों को पारित किया गया।
1 - कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020 -The Farmers produce trade and commerce (promotion and facilitation) Bill 2020
2 - कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 -The Farmers (Empowerment and protection) Agreement of price assurance and farm service bill 2020
3 - आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 The essential commodities (Amendment) Bill 2020


