पलायन के बीच उम्मीद की मिसाल बना बजीरा गांव।
पारंपरिक बीजों और एकीकृत खेती से विजयपाल सिंह नेगी ने बनाई रोजगार की राह।
जखोली- रोजगार के लिए पहाड़ से हो रहे पलायन के बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपनी मातृभूमि से जुड़े रहकर स्थानीय संसाधनों में ही रोजगार की संभावनाएं तलाशीं। ऐसे लोग न केवल स्वरोजगार का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, बल्कि पहाड़ में रहकर खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की राह भी दिखा रहे हैं।
जनपद रुद्रप्रयाग के विकासखंड जखोली का बजीरा गांव भी पलायन की चुनौती से अछूता नहीं रहा है। इसी गांव के विजयपाल सिंह नेगी ने पहाड़ के पारंपरिक कृषि संसाधनों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर रोजगार की संभावनाएं विकसित करने का प्रयास किया है। कृषि एवं उद्यान क्षेत्र के विशेषज्ञ विजयपाल सिंह नेगी देश की प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनियों आईटीसी, बजाज और वेदांता में उच्च पदों पर सेवाएं दे चुके हैं व वर्तमान में आईआरडी फाउंडेशन के निदेशक पद पर हैं। इसके अलावा वे नीति आयोग में एग्रीकल्चर एंड अलाइड सेक्टर से संबंधित कार्यों में भी सेवाएं दे चुके हैं।
वर्तमान में वह पहाड़ के पारंपरिक बीजों के संरक्षण और वैज्ञानिक तरीके से खेती को बढ़ावा देने पर काम कर रहे हैं। इनमें मंडुवा, चकराता राजमा, गहथ, बासमती, चौलाई और लाल धान जैसे पारंपरिक फसलों के बीज शामिल हैं।
विजयपाल सिंह नेगी के अनुसार, “उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद जिस मातृभूमि ने हमें इस लायक बनाया, उसके लिए हम कुछ नहीं कर पाए तो हमारा जीवन निरर्थक है।” उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने खेतों में एकीकृत खेती मॉडल विकसित किया है, जिसमें कीवी की बेल के नीचे हल्दी, ड्रैगन फ्रूट और अन्य नकदी फसलों का उत्पादन किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि बाजार में उत्पाद की मांग और भविष्य की संभावनाओं को समझना भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से लस्तर हिलाईं फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड विकासखण्ड जखोली मयाली गुप्तकाशी मार्ग सांकला के कार्यालय में किसानों के लिए समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं, जहां एकीकृत खेती और आधुनिक कृषि तकनीक से संबंधित जानकारी दी जाती है।
पलायन से जूझते पहाड़ में बजीरा गांव का यह प्रयास स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक बीजों और आधुनिक कृषि तकनीक को रोजगार से जोड़ने की संभावनाओं को सामने रखता है।




