सम्पादकीय
यूकेडी में इस्तीफों का दौर, 2027 से पहले संगठन की अग्निपरीक्षा।
अलग राजनीतिक मंच की चर्चा के बीच सवाल—क्षेत्रीय दल अपनी जमीन बचा पाएगा या बिखराव बढ़ाएगा?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) में सामने आ रहे संगठनात्मक मतभेदों और नेताओं-कार्यकर्ताओं के अलग होने के घटनाक्रम ने प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेताओं के निष्कासन, संभावित प्रत्याशियों को लेकर विवाद और अब अलग राजनीतिक मंच की कवायद ने यूकेडी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती बढ़ा दी है।
यूकेडी ने अगस्त में 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सभी 70 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए ‘संकल्प, नए उत्तराखंड का’ नीति एजेंडा जारी किया था। पार्टी ने मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को प्रमुखता देने की बात कही थी।
इसके बाद पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए। केंद्रीय अनुशासन समिति ने वरिष्ठ नेता आशुतोष नेगी को छह वर्ष के लिए निष्कासित किया। पार्टी की ओर से इसे अनुशासनात्मक कार्रवाई बताया गया, जबकि इसके बाद पार्टी के भीतर ही इस फैसले पर सवाल उठने की खबरें सामने आईं।
सितंबर में देहरादून में हुई एक बैठक में पार्टी के कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं द्वारा नेगी के निष्कासन को निरस्त करने तथा 36 विधानसभा क्षेत्रों के लिए संभावित प्रत्याशियों के नाम आगे बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव पारित किए जाने की खबर सामने आई। हालांकि इन नामों को केंद्रीय नेतृत्व की अंतिम स्वीकृति मिलने तक आधिकारिक प्रत्याशी मानना उचित नहीं होगा।
इसी बीच इस्तीफा देने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से यूकेडी डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाए जाने की चर्चा ने घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है। यदि यह मंच औपचारिक राजनीतिक संगठन के रूप में सामने आता है तो उसके सामने अपनी अलग पहचान, संगठन और जनाधार खड़ा करने की चुनौती होगी।
वहीं मूल यूकेडी के लिए चुनौती यह होगी कि वह आंतरिक विवादों से बाहर निकलकर जनता के बीच अपने मूल मुद्दों को कितना प्रभावी ढंग से रख पाती है। राज्य आंदोलन से निकली पार्टी के सामने 2027 में केवल चुनाव लड़ने का सवाल नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का भी सवाल है।
इस्तीफों और संगठनात्मक विवादों का असर जनता की धारणा पर किस दिशा में पड़ेगा, यह आने वाले महीनों में पार्टी और अलग हुए नेताओं के राजनीतिक कामकाज पर निर्भर करेगा। यदि विवाद लगातार सुर्खियों में रहते हैं तो क्षेत्रीय मुद्दों के बजाय संगठनात्मक खींचतान चर्चा का केंद्र बन सकती है। दूसरी ओर, यदि अलग हुए नेता और यूकेडी दोनों रोजगार, पलायन, भूमि, मूल निवास और स्थानीय अधिकार जैसे मुद्दों पर स्पष्ट एजेंडा लेकर जनता के बीच जाते हैं तो मतदाताओं के सामने क्षेत्रीय राजनीति के अलग-अलग विकल्प उभर सकते हैं।
यूकेडी ने 70 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी का ऐलान किया है और सितंबर में भी संगठनात्मक बैठकों के जरिए चुनावी रणनीति पर काम जारी रहने की खबरें सामने आई हैं।
ऐसे में 2027 का चुनाव यूकेडी के लिए संगठन, नेतृत्व और क्षेत्रीय मुद्दों—तीनों की परीक्षा होगा। असली सवाल यह रहेगा कि पार्टी अपने भीतर के मतभेदों को किस हद तक संभाल पाती है और क्या उत्तराखंड के क्षेत्रीय मुद्दों को संगठनात्मक विवादों से ऊपर रखकर जनता के सामने एक स्पष्ट राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत कर पाती है।
यूकेडी के लिए आने वाला समय केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि यह तय करने का समय है कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति में उसकी पहचान आगे किस रूप में दिखाई देगी—एक संगठित दल के रूप में या अलग-अलग क्षेत्रीय मंचों में बंटी राजनीतिक धारा के रूप में।


