भाजपा का बड़ा दांव: सामान्य सीटों पर भी आरक्षित उम्मीदवार उतारने की तैयारी, 2027 में बदलेगी रणनीति?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में 13 आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी आरक्षित चेहरों को मौका देने पर मंथन।
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनावी रणनीति को नए सामाजिक समीकरणों के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में जुटी है। पार्टी के भीतर प्रदेश की आरक्षित 13 विधानसभा सीटों के अलावा कुछ सामान्य सीटों पर भी अनुसूचित जाति के मजबूत और जिताऊ चेहरों को चुनाव मैदान में उतारने के विकल्प पर मंथन चल रहा है। भाजपा की यह संभावित रणनीति अमल में आती है तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी चयन की नीति में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है। संगठन के स्तर पर माना जा रहा है कि सामान्य सीटों पर भी प्रभावशाली अनुसूचित जाति चेहरों को अवसर देकर पार्टी अपने सामाजिक आधार को और मजबूत कर सकती है। साथ ही इसका उद्देश्य आरक्षित सीटों पर पार्टी की पकड़ को बनाए रखने और वहां जीत का आंकड़ा बढ़ाने के साथ-साथ अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी नए राजनीतिक समीकरण साधना बताया जा रहा है।
उत्तराखंड में विधानसभा की कुल 70 सीटों में 13 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन 13 आरक्षित सीटों में से नौ पर जीत दर्ज की थी, जबकि चार सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं। ऐसे में भाजपा की नजर अब आरक्षित सीटों पर अपना प्रदर्शन बरकरार रखने के साथ उन सामान्य सीटों पर भी है, जहां अनुसूचित जाति के प्रभावशाली नेताओं की स्थानीय पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता मजबूत मानी जाती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड की कुल आबादी 1,00,86,292 थी, जिसमें अनुसूचित जाति की आबादी 18,92,516 यानी करीब 18.76 प्रतिशत थी। यही वजह है कि प्रदेश की चुनावी राजनीति में अनुसूचित जाति का मतदाता वर्ग महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। भाजपा की संभावित रणनीति को इसी सामाजिक और राजनीतिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
इस बीच भाजपा संगठन में चल रहे ‘शुद्धिकरण’ अभियान और संगठन को मजबूत करने की कवायद के बीच सामान्य सीटों पर एससी चेहरों को अवसर देने की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में भी दिलचस्पी बढ़ा दी है। पार्टी प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन की ओर से भी इस मुद्दे पर चर्चा किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, सामान्य सीटों पर अनुसूचित जाति के उम्मीदवार उतारने का अंतिम फैसला अभी सामने नहीं आया है। माना जा रहा है कि टिकट वितरण के दौरान स्थानीय जनाधार, संगठन में सक्रियता, क्षेत्रीय समीकरण, सामाजिक स्वीकार्यता और चुनाव जीतने की क्षमता जैसे पहलुओं को प्रमुखता दी जाएगी। यदि भाजपा इस प्रयोग को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाती है तो कांग्रेस समेत अन्य दलों के सामने भी प्रत्याशी चयन और सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती बढ़ सकती है। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि उम्मीदवार चयन और बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों का भी चुनाव बन सकता है।


