मालू के पत्ते बन सकते हैं रोजगार का जरिया, प्लास्टिक का प्राकृतिक विकल्प

मालू के पत्तों से दोने पत्तल, मालू के पत्ते रोजगार का साधन, रुद्रप्रयाग में मालू के पत्ते, प्लास्टिक का प्राकृतिक विकल्प,मालू की कृषि वानिकी केदारनाथ
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मालू के पत्ते बन सकते हैं रोजगार का जरिया, प्लास्टिक का प्राकृतिक विकल्प।

हिमालय की आवाज़- मालू के पत्ते प्लास्टिक का विकल्प
मालू की बेल

रुद्रप्रयाग। पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति का रिश्ता सदियों पुराना है। यहां जंगल केवल ईंधन और चारे का स्रोत नहीं रहे, बल्कि स्थानीय जीवन, परंपराओं और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। कभी मालू और तिमला के पत्तों से तैयार दोने-पत्तल सामूहिक भोज और मांगलिक कार्यक्रमों की पहचान हुआ करते थे। बदलते दौर में प्लास्टिक और डिस्पोजेबल सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल से यह पारंपरिक व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म होती गई। ऐसे में मालू के पत्तों को फिर से रोजगार और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की संभावनाएं तलाशने की जरूरत है।

रुद्रप्रयाग जिले के खांकरा-खेड़ाखाल मार्ग, धारी देवी-सेरा भरदार मार्ग, सुमाड़ी भरदार, मवाण गांव, हरियाली, जाखाल, जखोली और शीशों गांव के जंगलों में मालू की बेल पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। इसके व्यवस्थित संरक्षण और उपयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

केदारनाथ यात्रा से मिल सकता है बड़ा बाजार

श्री केदारनाथ धाम यात्रा मालू से तैयार दोने-पत्तल के लिए बड़ा बाजार उपलब्ध करा सकती है। पिछले वर्ष बड़ी संख्या लगभग 18 लाख श्रद्धालु केदारनाथ यात्रा पर आए ओर यह यात्रा गौरीकुण्ड से श्रीकेदारनाथ तक व वापसी 2 दिन में होती है अब यदि आंकड़ों की बात करें तो यदि प्रत्येक आदमी 2 दिन में 3 बार भी भोजन करता है तो 54 लाख पत्तल की आवश्यकता होगी और एक पत्तल पर मार्जिन 1 रुपया भी होगा तो 54 लाख रुपये का लाभ 6 माह की अल्प अविधि में मिलेगा। पलायन से त्रस्त पहाड़ों के लिए मालू के पत्तल वरदान साबित हो सकते हैं। यदि यात्रा मार्ग के दुकानदारों और भोजनालयों में प्लास्टिक डिस्पोजेबल सामग्री के स्थान पर स्थानीय स्तर पर तैयार प्राकृतिक पत्तलों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए तो इससे प्लास्टिक कचरा कम करने के साथ ग्रामीण उत्पादों को बाजार भी मिल सकता है।

हालांकि बड़े पैमाने पर पत्तों के संग्रह से मालू की बेल को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए बंजर और अनुपयोगी खेतों में मालू का रोपण कृषि वानिकी के रूप में किया जा सकता है। पौध उत्पादन, पत्तों के संग्रह, दोने-पत्तल निर्माण और विपणन की पूरी प्रक्रिया से स्वयं सहायता समूहों, महिला समूहों और ग्रामीण युवाओं को जोड़ा जा सकता है।

गुणवत्तापूर्ण पौध उपलब्ध कराने की जरूरत

वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार के कुलपति डॉ. बीपी भट्ट ने कहा कि वन विभाग और शिक्षण संस्थानों को अन्य प्रजातियों के साथ मालू की भी पौध तैयार करनी चाहिए, ताकि लोगों को गुणवत्तापूर्ण पौध उपलब्ध हो सके। उन्होंने कहा कि स्वयं सहायता समूह और महिलाएं मालू के पत्तों से दोने-पत्तल तैयार कर रोजगार की दिशा में सशक्त कदम बढ़ा सकती हैं।

88 वर्षीय श्रीकृष्ण नौटियाल ग्राम डांगी भरदार ने बताया कि पहले गढ़वाल में सामूहिक भोज के लिए मालू और तिमला के पत्तों से थालियां और कटोरियां बनाई जाती थीं। प्लास्टिक के बर्तनों का चलन बढ़ने के बाद यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक कचरा लंबे समय तक नष्ट नहीं होता, जबकि मालू के पत्ते कुछ समय बाद सड़कर खाद में बदल जाते हैं।

उप वन संरक्षक रुद्रप्रयाग विनीत कुमार ने कहा कि यदि वन पंचायतों की ओर से मालू के पत्तों के उपयोग को लेकर माइक्रोप्लान में प्रस्ताव आते हैं तो नियमानुसार संस्तुति देने की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि काश्तकार अपने बंजर खेतों में मालू का कृषि वानिकी के रूप में रोपण कर सकते हैं।

मालू के संरक्षण, स्थानीय प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने की पहल होती है तो यह परंपरागत संसाधन रोजगार, महिला स्वरोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकता है।


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