उत्तराखंड: लगातार तीसरी बार सत्ता की हैट्रिक बनाने के लिए भाजपा का '25 क्लोज फाइट' सीटों पर विशेष फोकस।
एक सीट, एक प्रभारी’ रणनीति के तहत वरिष्ठ नेताओं को दी गई जिम्मेदारी।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी तैयारियों को तेज करते हुए उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष फोकस बढ़ा दिया है, जहां वर्ष 2022 के चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था या जीत बेहद कम अंतर से मिली थी। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ भाजपा ने विधानसभा स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट की रणनीति अपनाई है। पार्टी ने करीब 23 ऐसी सीटों को चिन्हित किया है, जहां संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर विशेष निगरानी की जाएगी। कुछ रिपोर्टों में करीबी मुकाबले वाली सीटों की संख्या 23 से 25 के बीच बताई गई है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटों पर जीत दर्ज कर बहुमत हासिल किया था। अब पार्टी की नजर 50 से अधिक सीटों पर है। इसके लिए वह न केवल 2022 में गंवाई गई सीटों को वापस हासिल करने की कोशिश कर रही है, बल्कि कम अंतर से जीती सीटों पर भी अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। 2022 के चुनाव परिणामों में लगभग 22 सीटों पर जीत-हार का अंतर पांच हजार मतों या उससे कम रहा था। इनमें 12 सीटों पर अंतर तीन हजार से कम और पांच सीटों पर एक हजार से भी कम मतों का रहा था।
भाजपा ने इन सीटों पर ‘एक सीट, एक प्रभारी’ की रणनीति के तहत वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपनी शुरू कर दी है। पार्टी की उत्तराखंड कोर ग्रुप की बैठक में विधानसभा स्तर पर संगठन को मजबूत करने और चुनाव से काफी पहले संभावित कमजोरियों की पहचान करने पर जोर दिया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को खटीमा, सांसद अनिल बलूनी को बद्रीनाथ और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को पिरान कलियर की जिम्मेदारी दी गई है।
विधानसभा प्रभारियों को अपने क्षेत्रों में संगठन की स्थिति, स्थानीय राजनीतिक समीकरण, संभावित प्रत्याशियों की स्वीकार्यता, सामाजिक समीकरण, मतदाताओं की प्राथमिकताएं और स्थानीय मुद्दों का आकलन करना होगा। इसके आधार पर पार्टी चुनाव से पहले ही कमजोर बूथों और नाराजगी वाले क्षेत्रों में सुधार की रणनीति तैयार करेगी।
भाजपा के इस कदम के पीछे 2022 के चुनाव में सामने आई स्थानीय नाराजगी, टिकट वितरण को लेकर असंतोष और संगठनात्मक कमजोरी जैसे कारण भी माने जा रहे हैं। पार्टी अब चुनाव के अंतिम दौर में सुधार करने के बजाय पहले से ही इन चुनौतियों पर काम करना चाहती है।
हालांकि भाजपा की रणनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी रुझान और स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी हो सकती है। हालिया सर्वेक्षणों में उत्तराखंड के मतदाताओं में मुख्यमंत्री की तुलना में स्थानीय विधायकों के प्रति अधिक असंतोष का संकेत सामने आया है। इससे आगामी चुनाव में प्रत्याशी चयन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
भाजपा अपने अभियान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार की उपलब्धियों, विकास योजनाओं, समान नागरिक संहिता, चारधाम यात्रा से जुड़ी सुविधाओं, पर्यटन और केंद्र-राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रमुख मुद्दा बनाने की तैयारी में है। वहीं पार्टी संगठनात्मक स्तर पर पूर्व सैनिकों सहित विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने पर भी काम कर रही है।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता बरकरार रखने का मुकाबला नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का रिकॉर्ड कायम करने की चुनौती भी है। ऐसे में 23 से 25 करीबी सीटों पर पार्टी का यह माइक्रो मैनेजमेंट अभियान उसकी चुनावी रणनीति की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक माना जा रहा है। इन सीटों पर भाजपा अपनी कमजोरियां दूर करने में कितनी सफल होती है और कांग्रेस समेत विपक्ष इन सीटों पर किस तरह चुनौती पेश करता है, इसका असर चुनावी परिणामों पर निर्णायक रूप से पड़ सकता है।


