क्या भटक गया साधन सहकारी समितियों का मूल उद्देश्य।
किसान-केंद्रित व्यवस्था से दूर होती सहकारिता।
रुद्रप्रयाग। किसानों को समय पर सस्ता ऋण, खाद-बीज, कृषि निवेश और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से गठित प्राथमिक कृषि ऋण समितियां और साधन सहकारी समितियां अब अपने मूल उद्देश्य से दूर होती दिखाई दे रही हैं। कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की स्थानीय जरूरतों का प्रमुख आधार मानी जाने वाली इन समितियों की भूमिका वर्तमान में बचत खाते, आरडी और सामान्य बैंकिंग गतिविधियों तक सिमटने को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
रुद्रप्रयाग जनपद में 34 साधन सहकारी समितियां संचालित हैं। वहीं किसान क्रेडिट कार्ड और कृषि ऋण की बड़ी जिम्मेदारी अब मुख्य रूप से वाणिज्यिक बैंकों के माध्यम से पूरी हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि किसानों को सस्ती फसली साख और कृषि निवेश उपलब्ध कराने का मूल दायित्व सहकारी समितियों का था, तो वर्तमान व्यवस्था में उनकी प्राथमिक भूमिका क्या रह गई है।
आईआरडी फाउंडेशन के निदेशक विजयपाल सिंह नेगी का कहना है कि जब वाणिज्यिक बैंक भी ऋण और बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं, तो साधन सहकारी समितियों के मूल दायित्वों की पूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी है। सहकारिता की संस्थाओं को केवल बैंकिंग गतिविधियों तक सीमित करने के बजाय उन्हें स्थानीय किसान अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाया जाना चाहिए।
भारतीय संविधान के भाग IX-ख में सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारिता के महत्व को रेखांकित करते हैं। किसानों को फसल की मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री से बचाने के लिए भंडारण सुविधा, समय पर सस्ता ऋण और स्थानीय स्तर पर कृषि निविष्टियां उपलब्ध कराना सहकारी व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल रहा है।
सरकार द्वारा साधन सहकारी समितियों के कंप्यूटरीकरण और उन्हें बहुउद्देशीय संस्थाओं के रूप में विकसित करने की पहल की जा रही है। इसके तहत कॉमन सर्विस सेंटर, जन औषधि केंद्र और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी सेवाओं से जोड़ने की दिशा में काम हो रहा है। लस्तर हिलाईं फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक हरीश पुण्डीर ने इसे सकारात्मक पहल बताते हुए कहा कि समितियों की प्राथमिक भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए। उनका कहना है कि समितियों को फिर से किसान-केंद्रित बनाकर स्थानीय स्तर पर कृषि बीज, जैविक खाद और सुलभ फसली ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
वहीं सहायक जिला निबंधक सहकारिता, रुद्रप्रयाग शैलेन्द्र सिंह ने बताया कि रुद्रप्रयाग जैविक जनपद होने के कारण साधन सहकारी समितियों के माध्यम से रासायनिक खाद एवं उर्वरक उपलब्ध नहीं कराए जा सकते। हालांकि किसान बीज, जैविक खाद अथवा अन्य कृषि संबंधी सामग्री की मांग करते हैं तो नियमानुसार उन्हें उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी।
ऐसे में जरूरत केवल समितियों के कंप्यूटरीकरण और बहुउद्देशीय विस्तार की नहीं, बल्कि उनकी मूल किसान-केंद्रित भूमिका को पुनर्स्थापित करने की भी है। सहकारिता तभी सार्थक होगी, जब उसका लाभ ग्रामीण क्षेत्र के अंतिम छोर पर खड़े किसान तक पहुंचे।


