गेंदा उत्पादन से आजीविका संवारने की अनूठी पहल

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 गेंदा उत्पादन से आजीविका संवारने की अनूठी पहल।

 बाजार की 'अधूरी कड़ियों' से सहम रहे मातृशक्ति के कदम।

रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में पारंपरिक कृषि के इतर नकदी फसलों को बढ़ावा देकर आजीविका सुधारने के प्रयास लगातार जारी हैं। इसी कड़ी में रुद्रप्रयाग प्रभाग के अंतर्गत 'उत्तराखंड जलवायु अनुकूल बारानी कृषि परियोजना' द्वारा तीन गांवों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में गेंदा फूल की खेती शुरू की गई है। इस महत्वाकांक्षी पहल के तहत मेंदनपुर गांव में दो समूहों की 17 महिलाएं और सेमा गांव में एक समूह की 6 महिलाएं व लौंगा गाव के 1 समूह की 5 महिलाएं करीब 56 नाली भूमि पर फूलों की फसल तैयार कर रही हैं। चारधाम यात्रा मार्ग पर गेंदे के फूलों की भारी मांग को देखते हुए यह प्रयोग पहाड़ों में स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का एक बड़ा और असरदार जरिया बन सकता है।





परंतु, इस सुनहरे भविष्य के बीच अतीत के कड़वे अनुभव और वर्तमान की अव्यवस्थाएं काश्तकारों के उत्साह को फीका कर रही हैं। पूर्व में भी ऐसी कई योजनाएं धरातल पर उतरीं, लेकिन परियोजना की अवधि समाप्त होते ही किसानों को उन्नतशील बीज और तकनीकी इनपुट मिलना बंद हो गया, जिससे वे पुनः पारंपरिक ढर्रे पर लौट आए। वर्तमान में भी सबसे बड़ी चुनौती 'मार्केट लिंकेज' की उभरकर सामने आई है। काश्तकार कंचन सजवाण बताती हैं कि बाजार की उचित व्यवस्था न होने से वे अब तक करीब 250 किलो फूल ओने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हो चुकी हैं। वहीं सुमन देवी, कंचन जगवाण, उर्मिला देवी, सीना देवी और राजेश्वरी देवी जैसी महिला किसानों का दर्द है कि मेहनत के बाद भी उन्हें सिर्फ जोखिम हाथ लग रहा है। खरीदार बड़े आकार के फूलों को लेने से कतरा रहे हैं, जिससे लागत निकालना भी दूभर हो गया है।

दूसरी ओर, इस गंभीर समस्या को लेकर परियोजना की ओर से सकारात्मक कदम उठाने की बात कही जा रही है। यूनिट इंचार्ज तिलवाड़ा ओमप्रकाश ने बताया कि परियोजना के माध्यम से आने वाले समय में फूल उत्पादन का क्षेत्र और बढ़ाया जाएगा। उन्होंने आश्वस्त किया कि महिलाओं को इस संकट से उबारने और उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए सामूहिक रूप से बाजार की मुकम्मल व्यवस्था तैयार करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यदि समय रहते इन महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधे केदारनाथ यात्रा मार्ग के स्थानीय बाजारों, मंदिर समितियों और होटल व्यवसायियों से जोड़ दिया जाए, तो यह पायलट प्रोजेक्ट न सिर्फ सफल होगा बल्कि रिवर्स माइग्रेशन और महिला सशक्तिकरण की एक नई इबारत लिखेगा।

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