पलायन की मार: उत्तराखंड में पहचान खोता पारंपरिक 'भीमल' उद्योग।
ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने के साथ-साथ 'रिवर्स पलायन' का एक बेहतरीन जरिया।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी ग्रामीण आर्थिकी और दैनिक जीवन की रीढ़ रहा पारंपरिक 'भीमल' (ग्रेविया अपोजिटिफोलिया) का रेशा आज भारी उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहा है। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने गांवों को खाली कर दिया है, जिसके चलते यह पारंपरिक रेशे निकालने की परम्परा अब लुप्त होने की कगार पर है।
स्थानीय निवासी सत्यनारायण भट्ट, भगवान सिंह, के अनुसार, 1990 के दशक तक रोजगार के लिए केवल परिवार का मुखिया बाहर जाता था, लेकिन आज बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की चाह में पूरे के पूरे परिवार शहरों की ओर रुख कर चुके हैं। जिन गांवों में कभी 90 परिवार रहते थे, वहां अब बमुश्किल 20 से 25 परिवार बचे हैं। गांवों में केवल बुजुर्ग ही रह गए हैं, जिससे पारंपरिक कार्यों को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है।
विमला देवी का कहना है कि पूर्व समय में, मार्च और अप्रैल के महीनों में भीमल की टहनियों को गदेरों (बरसाती नालों) के पानी में 45 दिनों तक भिगोकर (रेटिंग प्रक्रिया द्वारा) मानसून से पहले बेहतरीन प्राकृतिक रेशा तैयार किया जाता था। इस बहुपयोगी रेशे से घास लाने की रस्सी, कंडी, मवेशियों के बंधन और खेती-किसानी के उपकरण बनते थे। हालांकि, गांवों में जनशून्यता के कारण गदेरे गाद से भर गए और देखरेख के अभाव में इस प्राकृतिक रेशे की जगह अब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली प्लास्टिक की रस्सियों ने ले ली है। आज भीमल का उपयोग महज पशुओं के चारे तक सीमित रह गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भीमल में औषधीय और व्यावसायिक गुण कूट-कूट कर भरे हैं। इसकी छाल में 'सैपोनिन' होता है, जो प्राकृतिक शैम्पू का काम करता है। इसके अतिरिक्त, इसके रेशे से इको-फ्रेंडली चप्पलें, बैग और हस्तशिल्प बनाए जा सकते हैं, जिनकी बाजार में भारी मांग है। यदि सरकार और स्वयं सहायता समूह आधुनिक तकनीक के जरिए भीमल उद्योग को पुनर्जीवित करें, तो यह राज्य में ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने के साथ-साथ 'रिवर्स पलायन' का एक बेहतरीन जरिया बन सकता है।


