योजना फाइलों में बह रही या पाइपलाइन में आएगी

श्रेय लेने की होड़ के बीच प्यासी रह गयी जनता,
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श्रेय लेने की होड़ के बीच प्यासा है लोहाघाट: सरयू लिफ्ट योजना को लेकर फूटा जनता का आक्रोश।

खाली बर्तन लेकर 35 किमी दूर नदी पहुंचे लोग।

'योजना फाइलों में बह रही या पाइपलाइन में आएगी?' संघर्ष समिति की चेतावनी।

चम्पावत। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गर्मी की शुरुआत होते ही पेयजल संकट गहराने लगा है। जनपद चम्पावत के लोहाघाट नगर में पानी की किल्लत को लेकर अब जनता का सब्र जवाब दे गया है। एक तरफ जहां राजनीतिक मंचों और सड़कों पर मिष्ठान बांटकर 'सरयू लिफ्ट पेयजल योजना' की मंजूरी का श्रेय लेने की होड़ मची है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रही जनता ने अब नेताओं और प्रशासन को आईना दिखाना शुरू कर दिया है।

रविवार को 'लोहाघाट विकास संघर्ष समिति' के बैनर तले स्थानीय निवासियों ने एक अनोखा और ऐतिहासिक प्रदर्शन किया, जिसने जिले की सियासत की पोल खोलकर रख दी है। समिति के अध्यक्ष विपिन गोरखा के नेतृत्व में भारी संख्या में लोग खाली बर्तन लेकर लोहाघाट से करीब 35 किलोमीटर दूर सरयू नदी के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने नदी से पानी भरकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। जनता का कहना है कि यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उन खोखले दावों पर एक करारा तमाचा है, जिनके दम पर योजना के नाम पर राजनीति चमकाई जा रही है।

संघर्ष समिति के अध्यक्ष विपिन गोरखा ने लोहाघाट की भयावह स्थिति को उजागर करते हुए बताया कि नगर में पेयजल संकट अब विकराल रूप ले चुका है। मोहल्लों में लोगों को तीन से चार दिन के इंतजार के बाद महज नाममात्र का पानी नसीब हो रहा है। कई इलाकों में तो नलों से पानी की जगह सिर्फ हवा निकल रही है। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि घर की महिलाएं घरेलू काम और पीने के पानी के लिए मीलों दूर नौलों, धारों और हैंडपंपों से पानी ढोने को मजबूर हैं।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा जब 'सरयू लिफ्ट पेयजल योजना' को मंजूरी दी गई थी, तब लोहाघाट में राजनीतिक जश्न का माहौल बन गया था। एक तरफ भाजपा कार्यकर्ता इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बताने में जुट गए, तो दूसरी ओर कांग्रेस विधायक खुशाल सिंह अधिकारी भी इसका श्रेय लेने की दौड़ में कूद पड़े थे।

  करीब एक हफ्ते तक नगर में 'पहले मैं योजना लाया' का राजनीतिक ड्रामा चलता रहा। लेकिन आज जनता यह सवाल पूछ रही है कि अगर योजना सच में धरातल पर उतर गई होती, तो उन्हें खाली बर्तन लेकर 35 किलोमीटर दूर नदी तक क्यों भटकना पड़ता? समिति का कहना है कि जनता की मांग और लंबे संघर्ष के बाद ही मुख्यमंत्री ने इस योजना को मंजूरी दी थी, लेकिन मंजूरी के बाद भी निर्माण कार्य जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।

सरयू नदी के किनारे जोरदार नारेबाजी करते हुए संघर्ष समिति ने सरकार और प्रशासन को सीधे शब्दों में चेतावनी दी है। विपिन गोरखा ने कहा कि लोहाघाट की जनता को अब खोखली घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीन पर पाइपलाइन और नलों में पानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरयू लिफ्ट योजना का काम शुरू क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या यह योजना सिर्फ राजनीतिक पोस्टरों और सोशल मीडिया के प्रचार तक ही सीमित रहेगी? जब नेता श्रेय लेने में इतने तेज हैं, तो काम कराने में इतनी सुस्ती क्यों दिखाई जा रही है? समिति ने साफ किया है कि यदि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो पूरी जनता सड़कों पर उतरेगी और एक बड़े आंदोलन का शंखनाद करेगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

इस बड़े विरोध प्रदर्शन और आंदोलन के दौरान संघर्ष समिति के वरिष्ठ संरक्षक रमेश बिष्ट, अजय गोरखा, राज किशोर शाह, ललित शाह समेत भारी संख्या में स्थानीय मातृशक्ति और क्षेत्रवासी मौजूद रहे।


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