अब तो बदल लो नीतियां, वरना यादों में ही शेष रह जाएगी हरी संपदा।
बार-बार धधक रहे हैं एक ही इलाके के जंगल, ठोस 'फॉरेस्ट प्रोटेक्शन मॉडल' की दरकार।
उत्तराखण्ड के जंगलों में पिछले एक सप्ताह से लगी भीषण आग ने वन विभाग के तमाम दावों और तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है। धधकते जंगलों से उठने वाला धुआं अब रिहायशी इलाकों तक पहुँच गया है, जो बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गया है। आलम यह है कि हाल ही में अन्य विभागों के साथ आपसी सामंजस्य के लिए की गई मॉक ड्रिल धरातल पर पूरी तरह विफल साबित हो रही है।
वनाग्नि की घटनाओं से निपटने में वन विभाग खुद को असहाय महसूस कर रहा है। विभाग के पास फायर वाचरों की संख्या ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस राज्य में आग बुझाने के लिए जिस जनशक्ति की आवश्यकता है, उसके मुकाबले नाममात्र के कर्मचारी ही तैनात हैं। आधुनिक संसाधनों की कमी के चलते यह पूरी प्रक्रिया महज 'खानापूर्ति' बनकर रह गई है। रात-भर जूझने के बाद भी विभाग बेकाबू आग पर नियंत्रण पाने में नाकाम साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बांज और उत्तीस के जंगलों में नमी के कारण आग की घटनाएं कम होती हैं, लेकिन चीड़ के जंगल प्रदेश के लिए सिरदर्द बन चुके हैं। चीड़ की पत्तियां (पिरूल) और उसके फल (छेन्ति) बारूद की तरह काम कर रहे हैं। कई बार चीड़ उन्मूलन की मांग उठी, लेकिन शासन-प्रशासन की अनदेखी के कारण आज जंगल राख के ढेर में तब्दील हो रहे हैं। मौसम की प्रतिकूलता और बारिश न होने से स्थिति और भयावह हो गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि जिन क्षेत्रों में दिसंबर-जनवरी में आग लगी थी, वहां एक महीने के भीतर दोबारा आग धधक उठी है।
उत्तराखंड को देश में सर्वाधिक वन क्षेत्रफल वाले राज्यों का तमगा प्राप्त है, लेकिन उसी वन संपदा की सुरक्षा अब संकट में है। प्रकृति की विकट परिस्थितियों के सामने विभाग की वर्तमान योजनाएं 'धरी की धरी' रह गई हैं। अब समय आ गया है कि वन विभाग अपनी पुरानी नीतियों की समीक्षा करे और योजनाओं का पुनर्गठन करे। यदि जल्द ही एक ठोस और आधुनिक 'फॉरेस्ट प्रोटेक्शन मॉडल' तैयार नहीं किया गया, तो प्रदेश की यह अनमोल हरी संपदा केवल यादों में ही शेष रह जाएगी।
हिमालय की आवाज़ अपने सभी पाठकों से विनम्र अपील करता है कि वन हमारी अमूल्य धरोहर हैं। पहाड़ों का अस्तित्व और हमारी पहचान इन्हीं जंगलों से है। यह केवल पेड़ नहीं, हमारी विरासत हैं। आइए, वनों को आग और विनाश से बचाने का संकल्प लें। आपकी सतर्कता ही पहाड़ को सुरक्षित रखेगी।


