मत्स्य विभाग मानसिक दिवालिये का शिकार
सबसे छोटा विभाग का तमगा हासिल होने के बाद भी मत्स्य विभाग द्वारा बनाए गए 25 सहायक निदेशक।
क्षेत्र में कर्मचारी नहीं हैं इतने जितने सहायक निदेशक बना दिए गए यह मानसिक दिवालियापन नहीं तो और क्या है।
उत्तराखंड में हो क्या रहा है क्यों वित्त विभाग की नजर इनपर नहीं पड़ी की सबसे छोटा विभाग होने के बाद भी इतना वित्तीय बोझ कैसे सहन होगा। अपने चहेतों को कुछ समय पहले फायदा पहुंचाने के नाम पर किये गए विभागीय ढाँचे में फेरबदल में मौजूदा समय तक सहायक निदेशक के 7 पद होते थे। इन पदों को बढ़ाकर 25 कर लिया गया है। विभागीय ढांचा जिसकी आवश्यकता है उसे नहीं बढ़ाया गया है।
जबकि गावं, ब्लॉक या तहसील स्तर पर फील्डकर्मचारियों कितने हैं यह देखना है तो अपने जनपद मुख्यालय में जाकर देख सकतें हैं एक ऊँगली की गिनती भी ज्यादा होती है। जबकि जेष्ठ मत्स्य निरीक्षकों के 28 पद और मत्स्य निरीक्षकों के 62 पद थे जिन्हे बढ़ाया नहीं गया है। जबकि विभाग को चाहिए था कि फिल्ड कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर नए पदों को सृजित करके मत्स्य पालन विभाग की योजनाओं को धरातल पर उतारने में कामयाब होता।
शासन प्रशासन को इस पर ध्यान देना होगा और विभागीय ढाँचे का पुनर्गठन करना होगा।
पहले भी मत्स्य विभाग के द्वारा कारनामे किये गए थे जिसमें - मत्स्य विभाग के अफसरों ने खूब डकारा सरकारी खजाना, 'पानी' में पीएमओ के आदेश
ये मामला प्रधानमंत्री कार्यालय के सज्ञान में भी है। पीएमओ ने शासन को इसमें अग्रीम कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए हैं, बावजूद इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा संबंधित अधिकारी को प्रमोशन देने की तैयारियां की जा रही है। इस खबर ने तहलका मचाया था। क्या फिर से वही प्रमोशन का खेल खेला जा रहा है।


