वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह : रुद्रप्रयाग में मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान कब?

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 रुद्रप्रयाग में वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह-2026 का शुभारंभ।

रुद्रप्रयाग में वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह-2026 का शुभारंभ।

अगस्त्यमुनि। रुद्रप्रयाग वन प्रभाग की ओर से शुक्रवार को ब्लॉक सभागार अगस्त्यमुनि में वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह-2026 का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में जिला एवं सत्र न्यायाधीश नीना अग्रवाल, राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष ऐश्वर्या रावत, जिलाधिकारी विशाल मिश्रा, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सहित वन विभाग के अधिकारी, जनप्रतिनिधि, छात्र-छात्राएं और स्थानीय लोग मौजूद रहे।

रुद्रप्रयाग में वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह-2026 का शुभारंभ।


रुद्रप्रयाग में वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह-2026 का शुभारंभ।

रुद्रप्रयाग में वन्यजीव सुरक्षा सप्ताह-2026 का शुभारंभ।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश नीना अग्रवाल ने वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व के लिए जनभागीदारी और जागरूकता को जरूरी बताया। प्रभागीय वनाधिकारी विनीत कुमार मिश्रा ने कार्यक्रम की जानकारी दी। उप प्रभागीय वनाधिकारी जखोली डॉ. दिवाकर पंत ने प्रस्तुति के माध्यम से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उपाय बताए। पैरा-लीगल वालंटियर्स ने मानव-भालू संघर्ष से बचाव पर जागरूकता नाटक प्रस्तुत किया।

हालांकि, लगातार सामने आ रही घटनाओं के बीच वन्यजीव संघर्ष के स्थायी समाधान पर भी सवाल उठ रहे हैं। रुद्रप्रयाग में वर्ष 2025 और 2026 के दौरान गुलदार के हमलों में तीन महिलाओं की मौत तथा गुलदार और भालू के हमले की 15 से अधिक घटनाएं होने का दावा किया गया है।

आईआरडी फाउंडेशन के निदेशक विजयपाल सिंह नेगी ने कहा कि केवल भाषणों और जागरूकता नाटकों से संघर्ष की घटनाओं पर प्रभावी रोक संभव नहीं है। उन्होंने पारिस्थितिकी तंत्र की खाद्य श्रृंखला और वन्यजीवों के व्यवहार में आए बदलावों पर गहन शोध कर दीर्घकालिक समाधान तलाशने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि स्थायी समाधान के अभाव में घटनाओं के बाद मुआवजा देना ही सरकारी कार्रवाई तक सीमित रह जाएगा।

लस्तर हिलाईं फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी लिमिटेड के निदेशक सतीश भट्ट ने कहा कि जन जागरूकता से निदान का उपाय धरातल पर कैसे उतरेगा जब गावँ में बुजुर्ग ओर महिलाएँ अधिक हैं। जंगलीं जानवरों के कारण खेती बजंर हो रही हैं और बजंर भूमि का रकबा धीरे धीरे गावँ की तरफ बढ़ रहा है जो जंगलीं जानवरों का प्राकृतिक आवास बन रहा। आखिर बजंर होते खेत ओर खाली होते गावँ के लिए समूह ओर सहकारिता गठन का कदम पर्याप्त नही है जबतक जंगलीं जानवरों का निस्तारण व सिंचाई के साथ उन्नत खाद बीज किसान को नही मिलती। यदि खेती दुबारा से शुरू होती है तो खेतों में किसानों की उपस्थिति जंगलीं जानवरो को बस्तियों से दूर रखने में कामयाब होगी। वही जिन जानवरों से किसान को सर्वाधिक नुकसान पहुंचता हैं उनके लिए कोई विशेष योजनाओं का संचालन किया जाए। 


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