बदरीनाथ धाम के कपाट 16 नवंबर 2026 को रात 9:37 बजे होंगे बंद

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16 नवंबर को रात 9:37 बजे शीतकाल के लिए बंद होंगे बदरीनाथ धाम के कपाट, दुर्लभ ज्योतिषीय योग में निर्धारित हुआ मुहूर्त।

16 नवम्बर 2026 को बन्द होंगे बद्रीनाथ के कपाट बंद

बदरीनाथ धाम में छह माह तक मनुष्य करेंगे पूजा-अर्चना, कपाट बंद होने के बाद देवर्षि नारद के पूजा करने की है धार्मिक मान्यता।

उत्तराखंड। देवभूमि उत्तराखंड के चारधामों में प्रमुख श्री बदरीनाथ धाम की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं का विशेष महत्व है। भगवान बदरीविशाल के कपाट शीतकाल के लिए 16 नवंबर 2026, सोमवार को रात्रि 9 बजकर 37 मिनट पर बंद किए जाएंगे। इस वर्ष कपाट बंद करने का शुभ मुहूर्त कर्क लग्न के वर्गोत्तम नवमांश में निर्धारित किया गया है। सनातन परंपरा में इस अवसर को भगवान बदरीविशाल की शीतकालीन पूजा व्यवस्था के आरंभ से जोड़कर देखा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित मान्यता “षण्मासं दैवतैः पूज्याः षण्मासं मानवैस्तथा” के अनुसार, भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना वर्ष के छह माह मनुष्यों और छह माह देवताओं द्वारा किए जाने की परंपरा मानी जाती है। ग्रीष्मकाल में श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन और पूजा-अर्चना का अवसर मिलता है, जबकि शीतकाल के आगमन के साथ धाम के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद भगवान की पूजा से जुड़ी शीतकालीन धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाता है।

बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने की प्रक्रिया चारधाम यात्रा के महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ावों में शामिल है। कपाट बंद होने के साथ ही धाम में नियमित दर्शन और पूजा-अर्चना की व्यवस्था शीतकाल के लिए स्थगित हो जाती है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना से जुड़ी परंपराओं को विशेष श्रद्धा और आस्था के साथ स्मरण करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतकाल के छह महीनों में देवर्षि नारद भगवान बदरीविशाल के मुख्य पुजारी के रूप में नित्य पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में देवता भगवान की सेवा-पूजा करते हैं। यही विशिष्ट परंपरा श्री बदरीनाथ धाम को सनातन धर्म की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत और उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती है।

16 नवंबर को कपाट बंद होने के साथ ही बदरीनाथ धाम में शीतकालीन धार्मिक परंपराओं का एक नया चरण आरंभ होगा। भगवान बदरीविशाल के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और सदियों से चली आ रही पूजा-पद्धति इस परंपरा को विशेष महत्व प्रदान करती है।


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