संपादकीय
गुलदार के हमलों से उजड़ते परिवार, मुआवजे तक सिमटी सरकारी संवेदना! आखिर कब मिलेगा मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान?
मुआवजा देकर भूल जाती है सरकार! 20 वर्षों के शोध में सामने आई भयावह तस्वीर, जुलाई से अक्टूबर के बीच बढ़ते हैं हमले, बच्चों की जान पर सबसे अधिक खतरा।
ग्राम पंचायत देवल में महिला को गुलदार ने बनाया निवाला
उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल वन विभाग की चुनौती नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और सुरक्षा के लिए गंभीर संकट बन चुका है। नवंबर 2026 में पौड़ी जनपद के खांड्यूसैंण और कोटद्वार के स्नेह क्षेत्र तथा चंपावत के लोहाघाट विकासखंड के सुई-डूंगरी गांव में गुलदार के हमलों की घटनाओं ने एक बार फिर पहाड़ की इस पीड़ा को उजागर किया है। इन घटनाओं ने पिछले वर्ष रुद्रप्रयाग में गुलदार के हमलों में तीन महिलाओं की मौत और कई लोगों के घायल होने की घटनाओं की यादें भी ताजा कर दी हैं।
मयाली मखेत मोटरमार्ग पर आश्रम में महिला को बनाया गुलदार ने अपना निवाला
शोध के आंकड़े, जो चिंता बढ़ाते हैं-
हाल ही में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को आंकड़ों के माध्यम से सामने रखा है। वर्ष 2000 से 2019 के बीच उत्तराखंड में गुलदार के हमलों से संबंधित 1,914 और भालू के हमलों के 132 मामले अध्ययन में शामिल किए गए। शोध के अनुसार, इस अवधि में गुलदार के हमलों में 427 लोगों की जान गई। पौड़ी में कुल दर्ज हमलों का 21.6 प्रतिशत हिस्सा सामने आया, जबकि रुद्रप्रयाग में यह आंकड़ा 8.6 प्रतिशत रहा। प्रति 100 वर्ग किलोमीटर हमलों का घनत्व भी रुद्रप्रयाग में 8.6 दर्ज किया गया।
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रिपोर्ट का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि जुलाई से अक्टूबर के बीच गुलदार के हमलों में विशेष बढ़ोतरी देखी गई। बच्चों की मृत्यु का अनुपात भी सबसे अधिक पाया गया। यह स्थिति बताती है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अब मौसमी घटनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीणों की रोजमर्रा की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
एक हमला, जिसने उजाड़ दिया पूरा परिवार-
रुद्रप्रयाग के जखोली विकासखंड स्थित डांडा गांव के रमेश प्रसाद थपलियाल का परिवार इस त्रासदी का जीवंत उदाहरण है। उनकी पत्नी रूपा देवी खेती-किसानी और दैनिक मजदूरी के सहारे तीन बेटियों तथा एक बेटे का पालन-पोषण कर रही थीं। 30 मई 2025 को खेत में निराई-गुड़ाई करते समय गुलदार ने उनकी जान ले ली। एक महिला की मृत्यु के साथ परिवार की आर्थिक मजबूती, बच्चों का सहारा और वर्षों के संघर्ष से संजोई खुशियां भी छिन गईं। ऐसे ही देवल गावँ ओर मखेत गावँ में भी 2 महिलाओं को गुलदार द्वारा मारा गया था स्थिति लगभग एक जैसे है परिवार की रीढ़ महिलाएं ही नही रही तो उस परिवार की स्थिति क्या होती है यह सभी महसूस कर सकते हैं।
जखोली क्षेत्र में फरवरी 2024 से जुलाई 2025 तक गुलदार के हमलों की 16 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 13 लोग घायल हुए और तीन महिलाओं की मृत्यु हुई। ग्रामीणों ने प्रदर्शन किए, आदमखोर घोषित करने की मांग उठाई, लेकिन घटनाओं के बाद हमलावर वन्यजीवों की पहचान और प्रभावी नियंत्रण को लेकर कई सवाल आज भी कायम हैं।
सह-अस्तित्व के साथ सुरक्षा भी जरूरी-
वन विभाग द्वारा मानव और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व की अवधारणा पर जोर दिया जाना उचित है, लेकिन क्या जंगल से सटे खेतों में काम करने वाली महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा केवल जागरूकता के भरोसे छोड़ी जा सकती है? वन क्षेत्रों की वैज्ञानिक धारण क्षमता का आकलन, संवेदनशील गांवों की नियमित निगरानी, हमलावर वन्यजीवों की पहचान, त्वरित रेस्क्यू दल, सुरक्षित कृषि कार्य और प्राकृतिक खाद्य शृंखला का संरक्षण समय की आवश्यकता है।
सरकार को मुआवजे की औपचारिकता से आगे बढ़कर प्रभावित परिवारों के बच्चों की शिक्षा, आजीविका और दीर्घकालीन सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी।
पहाड़ के लोग वन्यजीवों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अपने खेतों और घरों के आसपास भय के साये में जीवन बिताने को विवश भी नहीं हो सकते। सवाल गुलदार के अस्तित्व का नहीं, बल्कि इंसान और वन्यजीव दोनों के सुरक्षित अस्तित्व का है। सरकार और वन विभाग को अब तय करना होगा कि उनकी संवेदना केवल घटना के बाद मुआवजा देने तक सीमित रहेगी या किसी दूसरे रमेश प्रसाद थपलियाल का परिवार उजड़ने से बचाने के लिए स्थायी समाधान भी तलाशा जाएगा।

