रिपोर्ट-स्तुति सेमवाल
उत्तराखंड की महिला किसान रच रही हैं समृद्ध भविष्य की कहानी।
पारंपरिक बीजों के संरक्षण से संवर रही आत्मनिर्भरता की राह।
उत्तराखंड के दुर्गम और ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती की कमान अब पूरी तरह महिलाओं के हाथों में सुरक्षित है। ये जुझारू पहाड़ी महिलाएं न केवल खेतों में पसीना बहा रही हैं, बल्कि वे राज्य की टिकाऊ कृषि प्रणाली और खाद्य सुरक्षा की असली रीढ़ बनकर उभरी हैं। आज तकनीक और नेतृत्व के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने के साथ-साथ ये महिलाएं पहाड़ों की समृद्ध कृषि विरासत को भी बखूबी सहेज रही हैं।
उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय बीजों के संरक्षण और पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए आईआरडी (IRD) फ़ाउंडेशन ग्रामीण स्तर पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है। संस्था के निदेशक विजयपाल सिंह नेगी ने इस मुहिम पर कहा कि "हमें इन दृढ़ संकल्पी महिला किसानों के साथ मिलकर काम करने पर गर्व है। आज हमारी आधुनिक खाद्य प्रणालियाँ बुनियादी पोषण संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने में विफल हो रही हैं, जिसके कारण समाज में कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं।"
वी0पी0 नेगी ने बताया कि संस्था का मुख्य ध्यान आने वाली पीढ़ियों के लिए पारंपरिक ज्ञान को बचाना, स्थानीय बीजों की पहचान कर उनकी संख्या बढ़ाना और खेती की वैज्ञानिक तकनीकों को बेहतर बनाना है। इससे न केवल फसलों की पैदावार और पोषण मूल्य में सुधार होगा, बल्कि किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
कृषि विशेषज्ञ हरीश थपलियाल मानना है कि असली टिकाऊ विकास अपनी जड़ों का सम्मान करने और एक स्वस्थ भविष्य का निर्माण करने में निहित है। उत्तराखंड की महिला किसानों द्वारा बचाया गया हर एक पारंपरिक बीज, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो रहा है। वहीं उद्यान विशेषज्ञ डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद कुकसाल ने कहा कि विपरित परिस्थितियों और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद देश का पेट भरने वाली इन आत्मनिर्भर पहाड़ी महिलाओं का अटूट जज़्बा आज पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।


