वनाग्नि का तांडव: चमोली और टिहरी में दो मौतें

टिहरी व चमोली के जंगल की आग बुझाने में दो की मौत,
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उत्तराखंड में वनाग्नि का तांडव: चमोली और टिहरी में दो मौतें।

फ़ोटो- प्रतीकात्मक

धरातल पर आग से जूझने वाले फायर वाचरों को आज भी बिना किसी पुख्ता सुरक्षा के सीधे 'मौत के मुंह' में धकेला जा रहा है।

 उत्तराखंड के पर्वतीय जंगलों में भड़की भीषण वनाग्नि ने इस सीजन में दो और जिंदगियां लील ली हैं। चमोली और टिहरी जिलों में आबादी की तरफ बढ़ती आग को रोकने के प्रयास में वन विभाग के एक फायर वाचर और एक स्थानीय महिला की दर्दनाक मौत हो गई। इस फायर सीजन में अब तक वनाग्नि की कुल 309 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे 257 हेक्टेयर वन क्षेत्र स्वाहा हो चुका है। गढ़वाल मंडल 227 घटनाओं के साथ सबसे अधिक प्रभावित रहा है, जबकि कुमाऊं में 50 मामले सामने आए हैं। सूबे के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इन हादसों की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं।

पहली हृदयविदारक घटना चमोली जिले में बदरीनाथ हाईवे के पास चीड़ के जंगलों में घटी। आग बुझाने गई 15 सदस्यीय टीम में शामिल 42 वर्षीय फायर वाचर राजेंद्र सिंह नेगी लापता हो गए थे। एसडीआरएफ और वन कर्मियों के संयुक्त रात्रि खोज अभियान के बाद, शुक्रवार सुबह घटनास्थल से 70 मीटर गहरी खाई में उनका बुरी तरह झुलसा हुआ शव बरामद हुआ। दिवंगत कर्मी के परिवार की मदद के लिए वन विभाग के कर्मचारियों ने अपना एक दिन का वेतन देने का निर्णय लिया है। वहीं दूसरी घटना टिहरी के कीर्तिनगर की है, जहां 50 वर्षीय अंजू देवी अपने खेतों की ओर बढ़ती लपटों को बुझाते समय आग की चपेट में आ गईं और उनकी मौत हो गई।

व्यवस्था पर सवाल: तकनीक की होड़ में हाशिए पर 'फायर वाचर'

इस भीषण त्रासदी ने एक बार फिर वन विभाग के दावों और मैदानी हकीकत की पोल खोलकर रख दी है। धरातल पर आग से जूझने वाले फायर वाचरों को आज भी बिना किसी पुख्ता सुरक्षा के सीधे 'मौत के मुंह' में धकेला जा रहा है।

हर साल दावानल की घटनाओं के बाद बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं। पिछले वर्ष कुमाऊं क्षेत्र में भी कुछ फायर वाचरों के जिंदा जलकर कोयला बनने की भयावह घटना सामने आई थी, जिसके बाद सुरक्षा उपकरण देने के बड़े-बड़े वादे किए गए थे।

अफसोस की बात यह है कि विभाग ने प्राथमिकताओं को ताक पर रखकर ड्रोन और अन्य महंगे आधुनिक उपकरणों की खरीद तो कर ली, लेकिन मोर्चे पर डटे फायर वाचरों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं हुईं। आज भी इन कर्मियों के पास गार्डन रैक और पेड़ों की टहनियों के अलावा आग बुझाने का कोई साधन नहीं है। यह सुरक्षा उपकरण खरीद तो कर दी पर जबतक फायर  वाचरों को आग बुझाने का तकनीकी प्रशिक्षण नही दिया गया तबतक उन्हें इन सुरक्षा उपकरणों को प्रयोग में लाने की आदत नही होगी सिर्फ चार महीने के लिए रखे गए फायर वाचरों को प्रशिक्षण दिया जाए जैसे फायर सर्विस के जवानों का समय समय पर प्रशिक्षण होता है। अन्यथा जबतक अग्रिम पंक्ति के इन रक्षकों को फायर-प्रूफ कपड़े, विशेष चश्मे और हेलमेट जैसे अनिवार्य जीवन-रक्षक उपकरण उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब तक वनाग्नि की हर घटना के साथ ऐसे मासूमों की आहुति लगती रहेगी।

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