जब पहाड़ के संकल्प के आगे बौना साबित हुआ सरकारी तंत्र

चौंदकोट जनशक्ति मार्ग,
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 रूप सिंह रावत/सतपुली पौड़ीगढ़वाल

जब पहाड़ के संकल्प के आगे बौना साबित हुआ सरकारी तंत्र

बिना सरकारी इमदाद, पसीने से लिखा इतिहास, ढोल-दमाऊ की गूंज और सामूहिक श्रमदान

पौड़ी गढ़वाल। हिमालय की ऊंचाइयों में केवल पत्थर और मिट्टी नहीं, बल्कि पहाड़ जैसी अटूट इच्छाशक्ति भी बसती है। इसका सबसे जीवंत उदाहरण है— चौंदकोट जनशक्ति मार्ग। यह मात्र 33 किलोमीटर का एक कच्चा रास्ता नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उस स्वाभिमान की गाथा है, जिसने 1951 में यह सिद्ध कर दिया था कि यदि समाज एकजुट हो जाए, तो संसाधनों का अभाव कभी प्रगति के आड़े नहीं आ सकता।

आजादी के चार साल बाद, जब देश अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था, तब पहाड़ों में सड़कों का नामो-निशान तक नहीं था। पौड़ी के चौंदकोट क्षेत्र के ग्रामीणों ने सड़क के अभाव में होने वाली पीड़ा को सहने के बजाय, उसे जड़ से मिटाने का संकल्प लिया। सतपुली के जमरिया बैंड से जणदा देवी तक की इस दुर्गम दूरी को तय करने के लिए न तो सरकारी बजट का इंतज़ार किया गया और न ही इंजीनियरों की किसी फौज का।

वह दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं रहा होगा, जब हजारों ग्रामीण अपने हाथों में गैंती, फावड़ा, कुदाल और सब्बल लेकर घरों से निकल पड़े। पहाड़ों की शांति को तोड़ती ढोल-दमाऊ की गूंज ने एक ऐसा जोश भरा कि बूढ़े, बच्चे और महिलाएं—सभी इस 'यज्ञ' में आहूति देने पहुंच गए। लोगों ने अपने घरों से अनाज इकट्ठा किया ताकि श्रमदान करने वालों का पेट भरा जा सके। न वहां कोई मशीन थी, न ही चट्टानें तोड़ने के लिए बारूद; वहां था तो सिर्फ पसीना, एकता और अपनी मिट्टी के लिए कुछ कर गुजरने का जज़्बा।

आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक

आज के आधुनिक युग में, जहाँ एक छोटी सी नाली या सड़क की मरम्मत के लिए भी महीनों तक सरकारी फाइलों और बजट का इंतज़ार किया जाता है, चौंदकोट जनशक्ति मार्ग हमें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाता है। यह सड़क इस बात का प्रमाण है कि समाज की सामूहिक शक्ति (Public Power) दुनिया की किसी भी सरकार से बड़ी होती है। यह मार्ग उन पूर्वजों का जीवंत स्मारक है, जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के सुगम भविष्य के लिए अपने वर्तमान को कठोर परिश्रम की आग में झोंक दिया।

एक सामाजिक क्रांति का प्रतीक

चौंदकोट जनशक्ति मार्ग महज़ एक यातायात का साधन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहली सामाजिक क्रांति है। यह हमें याद दिलाता है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी भले ही रुकती न हो, लेकिन पहाड़ का संकल्प हिमालय की तरह अडिग रहता है। आज इस ऐतिहासिक मार्ग को नमन करने का दिन है, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि उनके पूर्वजों ने सिर झुकाना नहीं, बल्कि पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाना सीखा था।

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