बैकडोर भर्ती में बर्खास्त कर्मियों के आंदोलन को यूकेडी ने दिया अपना समर्थन।
जिस मुद्दे को लेकर आम उत्तराखंडी आक्रोशित थे उसी मुद्दे का समर्थन करके यूकेडी क्या साबित करना चाहती है।
उत्तराखंड क्रांति दल के सदस्यों का हड़ताली बर्खास्त कर्मचारियों के साथ मिलकर उन्हें समर्थन देना कहीं न कहीं सवाल खड़े कर रही है।
बैकडोर से भर्ती होकर बर्खास्त हुए कर्मियों की हड़ताल को यूकेडी द्वारा समर्थन देना कहीं भंवर की राजनीति न बन जाये।
सेटिंग गेटिंग करके भर्ती हुए अपने को आगे और जिसका हक उसे धक्का इस तरह की योग्यताधारियों को समर्थन यूकेडी करेगी क्या यही मुद्दा रह गया था यूकेडी के लिए।
उत्तराखण्ड क्रांतिदल को उत्तराखंड के लोगों ने कैसे दिल से अपनाया और किन कारणों से दिल से बाहर उखाड़ फेंका यह इतिहास बन चुका है इस बार के विधानसभा चुनाव में यूकेडी में शामिल हुए युवा जोश को देखकर लग रहा था अब यूकेडी के दिन फिर से लौटेंगे ओर उत्तराखंड राज्य की की जन्मदात्री पार्टी जिसके प्रयास कभी भुलाए नही जा पाएंगे को लोगों के दिमाग में ऐसी शक्ल बना गयी थी कि यही पार्टी है जो हमें न्याय दिलाने में भविष्य में भी हमारे साथ खड़ी रहेगी पर चुनाव की चौखट पर पहुंचते ही किन्ही कारणों से वह सब नही हो पाया जिसे जनता ने चाहा था और हो गया काम।
यूकेडी के नए जोश ने जो आशा बांधी थी इसबार आज के हड़ताली कर्मचारियों को समर्थन देकर यूकेडी के द्वारा लिया गया निर्णय आत्मघाती साबित न हो।
इसका कारण है विधानसभा में बैकडोर से हुई भर्तियों में जो आज हड़ताल पर बैठे हैं यह सब सेटिंग-गेटिंग, मेवा-मिष्ठान, फल-फूल को समर्पित करके ही यहां भर्ती हुए थे। यदि नही हुए तो इनके लिए कौन सी परीक्षा आयोजित की गई थी। सब चेले चपाटों को भरकर ही मालदार बने हैं। क्या इसी सेटिंग गेटिंग के लिए उत्तराखंड बना था कि नेताओं के साथ रिश्तेदारी उठना बैठना करीबी बनकर रहने से भाग्योदय होगा।
विधानसभा में भर्ती के लिए जिस कोटिया जांच समिति के अनुसार पूर्ववर्ती भर्तियां भी इसी तरह से हुई हैं तो सलेक्टिव 228 को बाहर का रास्ता क्यों दिखाया गया इस लिए हम इन हड़ताली कर्मचारियों को समर्थन देते हैं यह बात कहकर यहीं चूक गयी यूकेडी।
यूकेडी के वरिष्ठ नेताओं को चाहिए था आपके पास मुद्दा था कि 228 बाहर हुए तो इसी तर्ज पर जब से विधानसभा में भर्तियां इस तरह से हुई हैं उन सबको बाहर करो के लिए धरना प्रदर्शन करते तो आपकी छवि कुछ और बनती।
अब सवाल है कि गोविंद सिंह कुंजवाल ओर यशपाल आर्य अपने कार्यकाल में हुई भर्तियों की जांच की मांग कर रहें हैं क्यों नही कर रही सरकार जांच यह मुद्दा जनजन तक पहुंचाने लायक मुद्दा था इस मुद्दे पर सही कदम उठाया पर मंच सही नही था।
आउटसोर्स से जो भी लगें हैं वह किसी एजेंसी के माध्यम से लगे हैं गड़बड़ी होने पर एजेंसी की जिम्मेदारी होती है कि उसके कर्मचारी ने गड़बड़ किया है सीधी भर्ती में सरकार की जिम्मेदारी होती है अपने कर्मचारी की पर बैकडोर से हुई भर्तियों के लिए कौन होगा जिम्मेदार।
आम उत्तराखंडी से पूछकर देखिये की 228 को बाहर करके विधानसभा अध्यक्ष ने जो निर्णय लिया उसे सुप्रीमकोर्ट तक ने जायज ठहराया है और यह मुद्दा जनता की अदालत में भी जायज ही है तो क्यों ऐसे मुद्दों पर राजनीति हो रही है। क्या सेटिंग गेटिंग वालों से मोह भंग नही हुआ इस हालात में पहुंचकर भी।
अन्य प्रदेशों में वहां के राजनीतिक दलों की राजनीति से सबक लेकर उत्तराखंड क्रांतिदल यहां राजनीति कर पाए तो भविष्य की आशा बन सकती है अन्यथा इसबार युवा जोश ने जो मेहनत की थी उसपर पानी फिरने की उम्मीदें फिर से बलवती हो चुकी हैं।


