पहाड़ में मौसम का 'अजीब' मिजाज

अनियमित बारिश से खेती को नुकसान,
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 पहाड़ में मौसम का 'अजीब' मिजाज: अनियमित बारिश ने तोड़ी खेती की कमर, बसंत में ही मुरझाई किसानों की उम्मीदें।

जखोली। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम के बदलते चक्र ने पारंपरिक खेती को संकट में डाल दिया है। कभी सूखे की मार तो कभी असमय अतिवृष्टि के कारण किसानों के चेहरे बसंत ऋतु के आगमन पर ही मुरझाने लगे हैं। पहाड़ की खेती का एक बड़ा हिस्सा असिंचित होने के कारण किसान पूरी तरह से बारिश पर निर्भर रहते हैं, लेकिन इस वर्ष प्रकृति की बेरुखी ने रबी की फसल को भारी नुकसान पहुँचाया है।

रबी की फसल, जिसमें मुख्य रूप से गेहूं, सरसों, मटर और मसूर शामिल हैं, की बुवाई नवंबर माह में की जाती है। फसल के जमाव के लिए नवंबर से जनवरी के बीच पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। लेकिन इस वर्ष इन तीन महीनों में बारिश न होने के चलते सिंचाई जल उपलब्ध नहीं हो सका। इसका सीधा असर सरसों और मटर की फसल पर पड़ा, जहाँ फरवरी में ही फूल लगने के कारण लगभग 80 फीसदी फसल नष्ट हो गई।

अब जब गेहूं और जौ की फसल 'दूधिया स्टेज' (दाना बनने की प्रक्रिया) पर है, तब पिछले कुछ दिनों से हो रही लगातार बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाओं ने बची-कुची उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है।

कृषि एवं उद्यान विशेषज्ञ श्री विजय पाल सिंह नेगी ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। उनके अनुसार, गेहूं और जौ के लिए अप्रैल का महीना 'क्रिटिकल स्टेज' (क्रांतिक समय) होता है। इस दौरान फसल को एक या दो हल्की सिंचाई और दाना पकने के लिए 18 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान की आवश्यकता होती है।

"बीज बनने की प्रक्रिया के लिए पर्याप्त सूर्य के प्रकाश और सही तापमान का होना अनिवार्य है। वर्तमान में लगातार हो रही बारिश और तापमान में गिरावट के कारण दाना अच्छी तरह नहीं पक पाएगा, जिससे गुणवत्ता और पैदावार दोनों प्रभावित होंगे।" - विजय पाल सिंह नेगी, कृषि विशेषज्ञ

विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों पर पिछले कुछ वर्षों से मौसम में हो रहे अचानक और अनिश्चित परिवर्तनों को देखते हुए अब किसानों को अपने पारंपरिक फसल चक्र पर दोबारा विचार करना होगा। ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से होने वाले नुकसान से बचने के लिए अब ऐसी किस्मों और तकनीकों की आवश्यकता है जो बदलते जलवायु परिवेश (Climate Change) के अनुकूल हों।

पहाड़ का किसान आज दोहरी मार झेल रहा है—बुवाई के समय सूखा और कटाई के समय ओलावृष्टि। यदि प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा इन किसानों को उचित मार्गदर्शन और मुआवजे का सहारा नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में पहाड़ों में खेती से लोगों का मोहभंग होना स्वाभाविक है।

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