पेड़ों की छाँव में ‘धूप’ ढूंढ रही 3 करोड़ की पेयजल योजना, प्यासा है चारधाम यात्रा का मुख्य पड़ाव चिरबटिया।
रुद्रप्रयाग- उत्तराखंड की वादियों में स्थित चिरबटिया अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात है। जनपद रुद्रप्रयाग और टिहरी की सीमा पर बसे इस छोटे से कस्बे की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह चारधाम यात्रा का एक प्रमुख पड़ाव है। गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन कर लौटने वाले हजारों तीर्थयात्री इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिस स्थान की सुंदरता और आबोहवा का लुत्फ उठाने के लिए सैलानी रुकते हैं, वही स्थान आज बुनियादी सुविधाओं, विशेषकर पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहा है। विभाग की अदूरदर्शिता और 'अद्भुत' नियोजन का आलम यह है कि यहाँ तीन करोड़ की लागत से बनी योजना सफेद हाथी साबित हो रही है।
रुद्रप्रयाग जल निगम ने लगभग एक वर्ष पूर्व ग्राम पंचायत लुठियाग के चिरबटिया क्षेत्र के लिए छप्परगाड नामक स्थान से चार किलोमीटर लंबी सोलर पंपिंग पेयजल योजना का निर्माण किया था। सरकार ने इसके लिए 3 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की थी। मकसद था—स्थानीय जनता और यहाँ रुकने वाले यात्रियों की प्यास बुझाना। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह योजना शुरू होने से पहले ही 'दगा' दे गई। ग्रामीणों का आरोप है कि जहाँ सोलर प्लेटें और टैंक बनाए गए हैं, वह स्थान घने जंगल और पेड़ों की छाँव में है। पर्याप्त धूप न मिलने के कारण सोलर पंप पानी उठाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में करोड़ों के पंप और पाइप लाइन महज शोपीस बनकर रह गए हैं।
चिरबटिया के पूर्व प्रधान रूप सिंह मैहरा और पूर्व उपप्रधान रूप सिंह कैंतूरा ने कड़ा रोष प्रकट करते हुए इसे सीधे तौर पर विभागीय लापरवाही का नतीजा बताया है। स्थानीय व्यापारी कमल सिंह मैहरा, धन सिंह मैहरा और हरीश सिंह का कहना है कि योजना बनाते समय साइट का सही सर्वे नहीं किया गया। यदि इन पंपों को सोलर के साथ-साथ विद्युत लाइन (बिजली) से जोड़ा गया होता, तो आज यह संकट पैदा नहीं होता। आज स्थिति यह है कि व्यापारियों ने यात्रियों के लिए लॉज और भोजन की व्यवस्था तो की है, लेकिन पानी के अभाव में उन्हें भारी फजीहत झेलनी पड़ रही है। स्थानीय लोगों के पास यदि दूसरा विकल्प न होता, तो आज पूरा कस्बा प्यास से बेहाल हो गया होता।
चिरबटिया में केवल पानी ही एकमात्र समस्या नहीं है। यात्रा सीजन के दौरान जब यहाँ तीर्थयात्रियों का रेला उमड़ता है, तो सार्वजनिक शौचालयों का अभाव मर्यादाओं और स्वच्छता अभियान की धज्जियां उड़ाता दिखता है। प्रशासन की अनदेखी का आलम यह है कि बार-बार गुहार लगाने के बावजूद न तो पेयजल योजना को सुधारा गया और न ही अन्य मूलभूत ढांचा विकसित किया गया। ग्रामीणों का दर्द है कि 'सीमांत गांव' होने के कारण वे हमेशा उपेक्षित रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव के समय नेता बड़े-बडे़ वादे करते हैं, लेकिन जीत हासिल करने के बाद वे चिरबटिया की सुध लेना भूल जाते हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या 3 करोड़ रुपये की योजना का खाका तैयार करते समय इंजीनियरों को यह नहीं दिखा कि घने पेड़ों के बीच सोलर प्लेटें काम नहीं करेंगी? क्या यह सरकारी धन की सरेआम बर्बादी नहीं है? एक तरफ सरकार उत्तराखंड को वैश्विक पर्यटन हब बनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर चारधाम यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव पर बुनियादी सुविधाएं शून्य हैं।
वर्तमान में चिरबटिया की जनता और व्यापार मंडल ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस योजना को विद्युत लाइन से जोड़कर सुचारू नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'गहरी नींद' से कब जागता है और कब चिरबटिया के लोगों को इस गंभीर जल संकट से निजात मिलती है।


