पिरूल से अब बनेगा 'काला सोना', रुद्रप्रयाग के जंगलों को आग से बचाने के साथ ही ऊर्जा का नया स्रोत।
आवश्यकता है तो बस एक मजबूत नीतिगत इच्छाशक्ति और जन-भागीदारी की, ताकि पहाड़ के इन जंगलों को आग से मुक्ति मिले और पिरूल से ऊर्जा का सृजन हो सके।
रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद में चीड़ के जंगल अब एक बड़ी समस्या के साथ-साथ आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग भी खोल सकते हैं। जनपद का लगभग 70 फीसदी आरक्षित वन क्षेत्र चीड़ बाहुल्य है। हर साल अप्रैल माह की शुरुआत से जैसे ही तापमान 24 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है और तेज हवाएं चलती हैं, चीड़ की सूखी पत्तियां (पिरूल) जंगलों में आग का सबसे बड़ा कारण बनती हैं। पिरूल में मौजूद टैनिन और रेजिन अत्यधिक ज्वलनशील होते हैं, जो न केवल वन संपदा बल्कि अमूल्य जीव-जंतुओं के जीवन के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करते हैं। हर साल लगने वाली ये आग पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाती है।
कभी पहाड़ में पिरूल का उपयोग पशुओं की बिछावन के लिए किया जाता था, जिससे जंगलों में इसका जमाव कम रहता था और आग की घटनाएं भी नियंत्रित रहती थीं। 15 वर्ष पूर्व तक गांवों में हर घर में गाय, भैंस और बैल हुआ करते थे। काश्तकार अपने जंगल को लेकर इतने सतर्क थे कि बाहरी लोगों के प्रवेश पर भी रोक टोक होती थी और आग लगने पर पूरा गांव एकजुट होकर बुझाने के लिए दौड़ पड़ता था। हालांकि, वर्तमान में पलायन और आधुनिक जीवनशैली के चलते पशुपालन लगभग समाप्त हो चुका है। अब गांवों में पशुओं की संख्या सिमटकर नाममात्र की रह गई है। ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं के पलायन और पीछे छूटे बुजुर्गों की शारीरिक अक्षमता के कारण जंगलों से पिरूल का उठाव शून्य हो गया है, जिसके चलते पिरूल का अंबार जंगलों को 'बारूद का ढेर' बना रहा है।
इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए सतीश भट्ट, डायरेक्टर 'लस्तर हिलाईं फार्मर प्रोडूसर कम्पनी लिमिटेड' और विजय पाल सिंह नेगी, निदेशक 'आईआरडी फाउंडेशन' ने पिछले 6 महीनों से चीड़ के पिरूल पर गहन शोध किया है। उनके शोध के आंकड़े बेहद उत्साहजनक हैं। रुद्रप्रयाग जनपद के आरक्षित वनों में चीड़ के जंगल लगभग 15,000 हेक्टेयर में फैले हैं। शोध के अनुसार, अप्रैल से 15 जून तक की अवधि में यहाँ से करीब 1.2 लाख मीट्रिक टन पिरूल उपलब्ध हो सकता है।इस पिरूल का वैज्ञानिक पद्धति से प्रसंस्करण कर 'ब्रिकेट' (Briquettes) बनाए जाएं, तो यह एलपीजी का एक बेहतरीन और सस्ता विकल्प बन सकता है। यह न केवल ग्रामीण इलाकों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि जंगलों में लगने वाली आग पर भी प्रभावी अंकुश लगाएगा। सतीश भट्ट का कहना है कि यह क्षेत्र आने वाले समय में लगभग 2 अरब रुपये का बड़ा कारोबार खड़ा करने की क्षमता रखता है।
यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का भी बड़ा माध्यम बन सकती है। यदि सरकार इस दिशा में नीतियां बनाकर बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराए और प्रोत्साहन दे, तो स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के नए द्वार खुलेंगे। चीड़ के पिरूल, जो अब तक वनों के विनाश का कारण बन रहे थे, सही प्रबंधन से 'काला सोना' बनकर रुद्रप्रयाग की आर्थिक और पर्यावरणीय तस्वीर बदल सकते हैं। आवश्यकता है तो बस एक मजबूत नीतिगत इच्छाशक्ति और जन-भागीदारी की, ताकि पहाड़ के इन जंगलों को आग से मुक्ति मिले और पिरूल से ऊर्जा का सृजन हो सके।


