राजनीति का 'दलबदलू' चक्र और लोकतंत्र की चिंता

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राजनीति का 'दलबदलू' चक्र और लोकतंत्र की चिंता।

हरदा काल में कांग्रेस ने आंतरिक अंतर्विरोधों और नेतृत्व परिवर्तन के झटकों का सामना किया था, आज 'आप' उसी राह पर खड़ी नजर आ रही है।

भारतीय राजनीति में दलों का टूटना और नेताओं का पाला बदलना कोई नई घटना नहीं है, लेकिन जब यह 'आम आदमी पार्टी' (आप) जैसी नवोदित और व्यवस्था परिवर्तन का वादा करने वाली पार्टी के साथ होता है, तो यह गंभीर मंथन की मांग करता है। हरदा काल में कांग्रेस ने जिस प्रकार के आंतरिक अंतर्विरोधों और नेतृत्व परिवर्तन के झटकों का सामना किया था, आज 'आप' उसी राह पर खड़ी नजर आती है। 2014 में विजय बहुगुणा के विस्थापन के बाद सतपाल महाराज का कांग्रेस से मोहभंग होना और 2016 में हरीश रावत के खिलाफ ग्यारह विधायकों का विद्रोह, महज राजनीतिक घटनाएं नहीं, बल्कि संगठन के भीतर पनपते असंतोष के स्पष्ट संकेत थे। आज 'आप' में राघव चड्ढा समेत सात सांसदों का पार्टी छोड़ना, उसी इतिहास की पुनरावृत्ति प्रतीत होता है।

इस पूरे घटनाक्रम में तकनीकी रूप से दलबदल कानून का पालन किया गया है, ताकि सदस्यता बची रहे, लेकिन नैतिकता के धरातल पर यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। यक्ष प्रश्न यह है कि दोष किसका है—पार्टी छोड़ने वाले नेताओं का या उस आंतरिक कार्यप्रणाली का जो उन्हें पलायन के लिए विवश करती है? जब भी कोई बड़ा नेता दल बदलता है, तो केवल एक चेहरा ही नहीं बदलता, बल्कि उस विचारधारा और संगठन को गहरी चोट पहुँचती है जिसने उसे पहचान दी थी। अंततः, इसका सबसे बड़ा नुकसान विपक्षी एकता और हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों को उठाना पड़ता है। यदि राजनीति केवल 'सप्ताह' और 'स्वार्थ' तक सिमट कर रह जाएगी, तो आम जनता का व्यवस्था से विश्वास उठना स्वाभाविक है। अतः, यह समय व्यक्तिगत राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर इस बात पर आत्मचिंतन करने का है कि आखिर क्यों 'विकल्प' बनने की आकांक्षी पार्टियां भी सत्ता के गलियारों में पहुँचते ही उसी संकट से जूझने लगती हैं, जिसे वे समाप्त करने का दावा करती थीं।

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