पहाड की बदहाली: बंदर और लंगूरों के आतंक से बदहाल गढ़वाल का किसान, खेतों मे फसल उगाना हुआ नामुमकिन।
किसानों की मुख्य समस्या जंगली जानवरों के आतंक पर कोई ठोस प्रयास न होना किसान को खेती से विमुख करवाने जैसे है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों का आतंक किसानों के लिए अभिशाप बन गया है। विशेषकर पहाड़ी जनपदों में बंदरों और लंगूरों की बढ़ती तादाद ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि खेतों में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी किसान अपनी लागत का 10 फीसदी उत्पादन भी बमुश्किल जुटा पा रहे हैं। इस समस्या के चलते न केवल कृषि कार्य ठप हो रहे हैं, बल्कि पलायन की रफ्तार भी तेज हो गई है।रुद्रप्रयाग जिले में अब तक 26 गाँव जनशून्य हो चुके हैं, अन्य जनपदों की स्थिति भी ऐसे ही जिसमे सबसे ज्यादा प्रभावित पौड़ी जनपद है गढ़वाल में अन्य कई गाँव जनशून्य की दिशा में बढ़ रहे हैं जो पहाड़ के लिए कोई शुभ संकेत नही है। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सरकार को योजनाबद्घ प्रयास करने होंगे।
पहाड़ के किसान पारंपरिक मोटे अनाज जैसे मण्डुवा, झंगोरा, राजमा और गहथ की खेती करते थे, जिन्हें जंगली सुअरों और घुरड़ से भारी नुकसान होता था। अपनी आर्थिकी सुधारने के लिए किसानों ने सरकार की योजनाओं से प्रेरित होकर नकद फसलें यानी सब्जी और फल उत्पादन की ओर कदम बढ़ाए। लेकिन, बंदरों और लंगूरों के झुंड तैयार खड़ी फसलों को पूरी तरह बर्बाद कर रहे हैं। समस्या की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोग अपने ही घरों में भोजन बनाने के लिए दरवाजे बंद रखने को मजबूर हैं। बंदरों के हमलों से आम आदमी और किसानों के घायल होने की खबरें अब आम हो चली हैं।
उद्यान विशेषज्ञ डॉ० राजेंद्र प्रसाद कुकसाल और स्थानीय काश्तकार ओमप्रकाश कोठारी, गंभीर सिंह, सुरेश थपलियाल, प्रदीप भट्ट का मानना है कि पलायन के कारण खाली पड़ी कृषि भूमि का बंजर होना और वहां उगी झाड़ियां जंगली जानवरों के लिए प्राकृतिक आवास बन गई हैं, जिससे उनकी संख्या बेतहाशा बढ़ी है। वहीं, वन विभाग के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। गढ़वाल क्षेत्र में बंदरों के लिए मात्र एक बंध्याकरण सेंटर (चिड़ियापुर) है जिसकी क्षमता स्वभाविक है कि गढ़वाल के क्षेत्रफल की अपेक्षा बहुत कम होगी। रुद्रप्रयाग प्रभाग में गतवर्ष लगभग 1800 बंदरों को पकड़ने का लक्ष्य रखा गया था जो लगभग हर वर्ष हर जनपद के लिए बन्दर पकड़ने के लक्ष्य निर्धारित किये जाते है जो नाकाफी होते हैं वहीं नगर निकाय क्षेत्रों में नगर निकायों को भी बन्दर बंध्याकरण करना होता हैँ जो बंधयाकरण केंद्रों की कमी की वजह से पूरा नहीं हो पा रहा है। रुद्रप्रयाग में गत वर्ष के लक्ष्य 1800 बन्दरों को पकड़ने का था जबकि जिले में 339 ग्राम पंचायतें हैं। इस हिसाब से एक गाँव के हिस्से में महज 5-6 बंदरों का पकड़ना आता है यह स्थिति लगभग उत्तराखण्ड के हर जनपद की है, जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
किसानों ने मांग की है कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल प्रभावी बंध्याकरण अभियान से ही संभव है। जब तक कुल संख्या के कम से कम दो-तिहाई बंदरों की निरंतर 3 से 4 वर्षों तक नसबंदी नहीं की जाती, तब तक राहत की उम्मीद कम है। सरकार को प्रत्येक जनपद में बंध्याकरण सेंटर की स्थापना करनी होगी, ताकि खेती को पुनर्जीवित किया जा सके और पहाड़ के किसान को पलायन करने से रोका जा सके।


