पहाड़ों में बारिश: कहीं फसलों को मिली 'संजीवनी', तो कहीं कीटों के हमले का बढ़ा खतरा

फसलों के लिए 'क्रिटिकल स्टेज',
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पहाड़ों में बारिश: कहीं फसलों को मिली 'संजीवनी', तो कहीं कीटों के हमले का बढ़ा खतरा

फसलों के लिए 'क्रिटिकल स्टेज' पर राहत, वर्षा से न केवल धधकते जंगल शांत हुए हैं, बल्कि अब जली हुई जमीन पर नई कोपलों के आने का मार्ग प्रशस्त हो गया

जनवरी की लंबी शुष्क अवधि के बाद मार्च के तीसरे सप्ताह में शुरू हुई बारिश पहाड़ों की खेती के लिए मिश्रित परिणाम लेकर आई है। लंबे इंतजार के बाद बरसे बादलों ने जहाँ असिंचित क्षेत्रों की दम तोड़ती फसलों को 'संजीवनी' देने का काम किया है, वहीं तापमान में अचानक उतार-चढ़ाव ने किसानों की चिंता भी बढ़ा दी है।

पहाड़ों में वर्तमान में गेहूं, जौ, सरसों और मटर जैसी खाद्यान्न फसलें तैयार हो रही हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं और जौ की फसल इस समय अपनी सबसे महत्वपूर्ण यानी 'दूधिया अवस्था' (Milking Stage) में है। यह फसल चक्र का वह 'क्रिटिकल स्टेज' होता है जब पौधों को नमी की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। सिंचाई के साधनों के अभाव में सूखी पड़ रही खेती के लिए यह बारिश अमृत समान मानी जा रही है, जिससे दानों के भराव और गुणवत्ता में सुधार होगा। इसके अतिरिक्त, गोभीवर्गीय सब्जियों और राई की फसलों को भी इस नमी से काफी लाभ पहुँचने की उम्मीद है।

भले ही बारिश ने राहत दी है, लेकिन आने वाले कुछ दिन किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। यदि बारिश के तुरंत बाद धूप खिलती है और तापमान 25°C से 30°C के आसपास पहुँचता है, तो वातावरण में नमी और गर्मी के मेल से 'माहू' (एफिड्स) जैसे कीटों के पनपने की प्रबल संभावना बन जाती है। 

यह बारिश केवल खेती ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी वरदान साबित हुई है। जनवरी और फरवरी के महीनों में जंगलों में लगी भीषण आग ने वन संपदा और वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुँचाया था। इस वर्षा से न केवल धधकते जंगल शांत हुए हैं, बल्कि अब जली हुई जमीन पर नई कोपलों के आने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इससे जंगली जानवरों के लिए चारे की किल्लत दूर होगी और पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने में मदद मिलेगी।


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