घोघा देवता के नृत्यों से महकी देहलियां

फूलदेई- पहाड़ की समृद्ध विरासत,
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फूलदेई पर्व: घोघा देवता के नृत्यों से महकी देहलियां, बच्चों ने प्रकृति संग निभाया निश्छल प्रेम का नाता।

समृद्ध लोक कला का संरक्षण जरूरी,प्रकृति को इष्ट मानने की समृद्ध विरासत।

रुद्रप्रयाग। चैत्र मास की संक्रांति से शुरू हुआ लोक पर्व 'फूलदेई' अपने आठवें दिन और भी भक्तिमय हो उठा है। गांवों में नन्हें बच्चों की टोली ने 'फूल देई, छम्मा देई' के गीतों के साथ न केवल देहलियों को फूलों से सजाया, बल्कि आठवें दिन विशेष रूप से घोघा देवता के आगमन से समूचा पहाड़ उत्सव के उल्लास में डूब गया। घर-घर जाकर घोघा देवता के दर्शन और पारंपरिक नृत्य ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर दिया है।

फूलदेई केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति को 'इष्ट' मानकर उसकी आराधना करने की हमारी समृद्ध विरासत है। चैत्र की चिलचिलाती धूप से पहले, सूर्योदय की पहली किरण के साथ बच्चे खेतों और जंगलों से फ्योंली, बुरांश और बासिंग के फूल चुनकर लाते हैं। इन फूलों को घर की देहली (चौखट) पर अर्पित करना इस बात का प्रतीक है कि पहाड़ के लोग प्रकृति को अपनी सबसे बड़ी धरोहर समझते हैं। यह बच्चों और प्रकृति के बीच के उस निश्छल प्रेम को दर्शाता है, जहाँ इंसान खुद को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अभिन्न अंग मानता है।

विगत कुछ दशकों में बढ़ते पलायन और भौतिकवाद की चकाचौंध ने पहाड़ की कई जीवंत परंपराओं को चोट पहुंचाई है। कभी गांवों में गूंजने वाली फूलदेई की टोलियां अब सिमटने लगी हैं। गढ़वाल की कई लोक कलाएं और रीतियां आज विलुप्ति के कगार पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हम अपनी इस विरासत को नहीं बचाते, तो आने वाली पीढ़ियां प्रकृति के प्रति इस समर्पण और आत्मसात करने वाली संस्कृति से महरूम रह जाएंगी।

फूलदेई त्योहार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण संरक्षण को धर्म और उत्सव से जोड़ा था। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है, तब पहाड़ का यह 'फूल उत्सव' हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाता है। घोघा देवता की पूजा और बच्चों का यह उत्साह इस बात की याद दिलाता है कि पहाड़ की असल पहचान उसकी मिट्टी, उसके फूल और उसकी लोक परंपराओं में ही निहित है।


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