मयाली में विराट हिंदू सम्मेलन: शोभायात्रा के साथ गूंजा संस्कृति संरक्षण और एकजुटता का संदेश।
वैचारिक उद्बोधन: संस्कृति ही राष्ट्र का आधार,भव्य शोभायात्रा और भक्तिमय वातावरण।
रुद्रप्रयाग। जनपद रुद्रप्रयाग के जखोली विकासखंड स्थित मयाली में बृहस्पतिवार को 'विराट हिंदू सम्मेलन' का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक समागम में हजारों की संख्या में जुटे श्रद्धालुओं, मातृशक्ति और युवाओं ने सनातन संस्कृति की रक्षा और सामाजिक समरसता का सामूहिक संकल्प लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल आध्यात्मिक चेतना जागृत करना था, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर राष्ट्र निर्माण के लिए युवाओं को प्रेरित करना भी रहा।
सम्मेलन का शुभारंभ एक विशाल और पारंपरिक शोभायात्रा के साथ हुआ। ढोल-दमाऊं की थाप और शंखध्वनि के बीच निकली इस यात्रा में समूचा मयाली क्षेत्र केसरिया रंग में रंगा नजर आया। जय श्रीराम और धार्मिक जयघोषों से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। शोभायात्रा में स्थानीय महिलाओं और युवाओं की भारी सहभागिता ने यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है।
सम्मेलन के मुख्य वक्ता, विश्व हिंदू परिषद के क्षेत्रीय संगठन मंत्री मुकेश जी ने अपने प्रभावशाली संबोधन में कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सनातन संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा:
"हमारी परंपराएं और सांस्कृतिक मूल्य ही समाज को जोड़ने वाली शक्ति हैं। राष्ट्र निर्माण और सामाजिक एकजुटता में प्रत्येक वर्ग, विशेषकर युवाओं को अपनी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करनी होगी।"
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे संगठन समाज सेवा के विभिन्न आयामों के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाने का कार्य कर रहा है।
कार्यक्रम में स्वामी शिवानंद गिरि ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि संस्कृति ही हमारी मूल पहचान है। उन्होंने आह्वान किया कि समय की मांग है कि हम अपनी धरोहरों को सहेजें और नई पीढ़ी को संस्कारों से ओत-प्रोत करें। सम्मेलन में जिला प्रचारक पंकज गड़िया, सचिन, वेणी माधव भट्ट, भूपेंद्र जी, मेहरबान सिंह समेत बसंती बुटोला और मधु बुटोला जैसे कई गणमान्य व्यक्तियों ने उपस्थिति दर्ज कराई।
इस विराट सम्मेलन का मूल ध्येय हिंदू समाज को संगठित करना, सांस्कृतिक अतिक्रमण को रोकना और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि जब समाज संगठित और जागरूक होता है, तभी वह चुनौतियों का सामना कर सकता है। अंत में, उपस्थित जनसमूह ने अपनी संस्कृति की रक्षा और राष्ट्र सेवा का संकल्प लेकर कार्यक्रम का समापन किया।




