वनाग्नि से बचाव -मॉक ड्रिल तक सीमित रहा कार्यक्रम।
आग की घटना पर वन विभाग जूझ रहा रातभर। फायर वाचरों की टीम में नाम मात्र के सदस्य होने से आग की घटनाओं को काबू करना मुश्किल।
वनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए तमाम तरह के प्रयास वन विभाग द्वारा किये गए जिसमें अभी हाल में मॉक ड्रिल भी की गई थी जिसमे अन्य विभागों को भी सम्मिलित किया था तथा कहा गया कि आपसी सहयोग और सामंजस्य से आग पर काबू पाने की यह मॉक ड्रिल सफल रही पर हकीकत कुछ और ही निकली।
हम कितने भी दावे कर ले पर प्रकृति के साथ हम जीत नही पाएंगे। तमाम तैयारियां तब धरी की धरी रह जाती हैं जब विकट भौगोलिक क्षेत्र में वनाग्नि की घटनाओं के बाद उसपर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। मौसम प्रतिकूल होने से आग की घटनाएं लगातार हो रही हैं और समय पर बारिश न हुई तो दिसम्बर माह ओर जनवरी माह में आग की चपेट में आये जंगल दुबारा से 1 महीने के अंतराल पर फिर से आग उन्ही क्षेत्रों मे लगनी शुरू हो गयी है।
आग की घटनाओं को यदि देखें तो बांज या उत्तीस के जंगलों में बहुत ही कम लगती है क्योंकि इन वनों की मिट्टी में नमी अधिक होती है वही दूसरी तरफ चीड़ के जंगल मे पिरूल पत्तियों ओर चीड़ के फल जिन्हें गढ़वाल क्षेत्र में छेन्ति के नाम से जाना जाता है आग की घटनाओं के लिए बारूद का काम करती है। कई बार चीड़ उन्मूलन हेतु आवाज़ उठी हैं पर इनपर कोई ध्यान न देने के चलते आग से जंगल धधक रहे हैं।
वन विभाग जिसका जिम्मा जंगलों के सरंक्षण व संवर्धन का है उन्ही के पास फायर वाचरों की टीम सिर्फ नाम मात्र के लोग हैं जबकि वन क्षेत्रफल ओर आग की घटनाओं को देखते हुए इनकी संख्या अधिक होनी चाहिए थी जो विचारणीय प्रश्न है। फायर वाचर टीम के पास संसाधनों की कमी विषम भौगोलिक क्षेत्र के लिए पर्याप्त न होने से ही सिर्फ यह खानापूर्ति तक सीमित रहने की बात लगती है। वह महकमे को चाहिए कि योजनाओं के पुनर्गठन या नई योजनाओं को इस तरह से तैयार करे कि वन सरंक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य जिसका अनुसरण अन्य करे का मॉडल तैयार हो यह अपेक्षा वन विभाग उत्तराखण्ड से इसलिये भी है क्योंकि सबसे ज्यादा जंगल का तमगा भी इस पहाड़ी राज्य को मिला है और कार्बन क्रेडिट का हिस्सा भी यही राज्य अन्य के लिए जीवन के लिए आवश्यक हवा और पानी के सबसे अधिक उत्पादक होने के चलते ले रहें हैं।


