पहाड़ पर 'डबल ड्यूटी' का बोझ: उत्तराखंड की महिलाएं क्यों झेल रही हैं अनदेखी।
सरकार मुआवजे की खानापूर्त्ति से आगे बढ़कर संरक्षण और सशक्तिकरण की दिशा में प्रभावी कदम उठाए।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाएं आज भी एक अनकही और अथाह 'पहाड़ सी जिम्मेदारी' ढो रही हैं। रोजगार की तलाश में पुरुषों के बड़े पैमाने पर पलायन (लगभग 80%) के कारण, इन महिलाओं पर खेती-किसानी, पशुपालन, और घर-गृहस्थी का 'डबल बोझ' आ गया है। तमाम सरकारी कोशिशों और विश्व बैंक समर्थित योजनाओं के बावजूद, जमीनी स्तर पर महिलाओं के जीवन में कोई खास सकारात्मक बदलाव नहीं आया है, जिससे उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
पुरुष पलायन: एक सामाजिक-आर्थिक त्रासदी
पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के पर्याप्त साधन न होने के कारण पुरुष वर्ग निजी क्षेत्रों में काम करने के लिए मजबूरन घर से दूर जा रहा है। इसका सीधा असर घर की महिलाओं पर पड़ा है। वे न केवल परिवार की देखभाल कर रही हैं, बल्कि पूरे कृषि-पशुपालन तंत्र को भी संभाल रही हैं। यह अतिशय श्रम महिलाओं के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
स्वास्थ्य पर गंभीर संकट: महिलाओं में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि वे अपनी बीमारी को तब तक टालती रहती हैं जब तक कि वह गंभीर न हो जाए। नतीजतन, अस्पताल जाने पर उन्हें लंबे और महंगे इलाज की आवश्यकता होती है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि उनके पास मौजूद समय और कार्यबोझ की मजबूरी है।
जंगल का खतरा और बेमानी मुआवजा
महिलाओं का कार्यबोझ कम करने की योजनाएं कागजों पर तो हैं, लेकिन धरातल पर उनका ढांचा महिला-केंद्रित नहीं है। आज भी महिलाएं घास और चारापत्ती के लिए खतरनाक जंगलों में जाने को विवश हैं, जहां जंगली जानवरों के हमले का खतरा हर दिन बना रहता है।
समाचारों में लगभग हर दिन इन हमलों की खबरें आती हैं, जिसमें कितनी ही महिलाएं अपनी जान गवां चुकी हैं और घायल हुई हैं। विडंबना यह है कि प्रशासन केवल मुआवजा देकर अपने 'कर्तव्यों की इतिश्री' कर देता है, जबकि पहाड़ की 'रीढ़' समझी जाने वाली इन महिलाओं का जीवन हर पल खतरे में है।
योजनाओं का विरोधाभास: 'निष्प्रयोज्य' मशीनरी और कृषि की उपेक्षा
महिलाओं के कार्यबोझ को कम करने के लिए लाई गईं केंद्र और राज्य की योजनाएं, जैसे कि विश्व बैंक सहायतित योजनाएं, अपने उद्देश्य से भटकती दिख रही हैं।
फार्म मशीनरी बैंक: इन बैंकों में दिए जाने वाले कृषि उपकरण अक्सर बाजार मूल्य से 3 से 4 गुना तक महंगे होते हैं, और कई तो निष्प्रयोज्य (बेकार) साबित होते हैं, जिससे महिलाओं का श्रम कम होने के बजाय और बढ़ जाता है।
मनरेगा की अनदेखी: मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना में कृषि घेरबाड़ (खेती की जमीन की सुरक्षा) को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। जंगली सुअर, स्याही, घुरड़ जैसे जानवर फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। पहले ही मानवशक्ति का अभाव है, जिससे खेती की लागत अधिक है और उत्पादन लागत के दसवें हिस्से का भी नहीं होता। ऐसे में महिलाओं का सारा श्रम बेकार हो जाता है।
कार्यबोझ कम करने के लिए ठोस और प्रभावी उपाय
पहाड़ की महिलाओं को राहत देने और उनके जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए योजनाओं में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। निम्न उपायों पर तत्काल ध्यान देना अनिवार्य है:
पर्याप्त वृक्षारोपण: स्थानीय स्तर पर घास और चारापत्ती के वृक्षारोपण को बढ़ावा देना, ताकि महिलाओं को लंबी और खतरनाक जंगल यात्रा से मुक्ति मिल सके।
निर्बाध पेयजल आपूर्ति: घर तक पेयजल की आपूर्ति निर्बाध गति से सुनिश्चित करना, जिससे पानी लाने में लगने वाला उनका अधिकांश समय बच सके।
पशुपालन प्रशिक्षण: पशुओं हेतु साइलेज (Silage) और भूषा (Fodder) स्टोर करने का प्रशिक्षण देना, जिससे साल भर चारे की समस्या कम हो।
नियमित स्वास्थ्य परीक्षण: महिलाओं के लिए गाँव-गाँव में नियमित और अनिवार्य स्वास्थ्य परीक्षण शिविरों की व्यवस्था, ताकि बीमारियों का पता शुरुआती चरण में लगे।
विद्यालयों की सुगमता: विद्यालयों का नजदीक होना सुनिश्चित करना, जिससे बच्चों को स्कूल भेजने में महिलाओं का समय कम खर्च हो।
स्वरोजगार और मार्केटिंग: स्वरोजगार हेतु प्रासंगिक प्रशिक्षण देना और प्रशिक्षण के बाद तैयार उत्पाद की मार्केटिंग (विपणन) की मजबूत व्यवस्था करना, ताकि आर्थिक स्वतंत्रता और आय सुनिश्चित हो।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाएं न सिर्फ घर संभाल रही हैं, बल्कि राज्य की संस्कृति और कृषि अर्थव्यवस्था की आधारशिला भी हैं। उनके जीवन को खतरे में डालकर और उनके श्रम को अनदेखा करके, हम राज्य के भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं। यह वक्त है कि सरकार मुआवजे की खानापूरी से आगे बढ़कर संरक्षण और सशक्तिकरण की दिशा में प्रभावी कदम उठाए।


