रामरतन पवांर/गढ़वाल ब्यूरो।
बुद्धिमता का लक्षण भक्ति है आचार्य ममगांई।
भक्ति का प्रारंभ बुद्धिहीनता का लक्षण नही है इसलिए मानव को साधना करनी चाहिए ऐसा आग्रह है बिना साधना के अचानक कुछ मिलता है वह सृष्टि का रहस्य नही है गीता का यही विशिष्ट वैशिष्ट्य है।
उपनिषद की भी यही विशेषता है ये विचार केवल गीता व उपनिषद में कहे गए हैं उक्त विचार ज्योतिष्पीठ व्यास आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं जी ने अखिल गढ़वाल सभा रामेश्वरम मन्दिर में महिला कल्याण समिति द्वारा आयोजित शिवमहापुराण की कथा के षष्ठम दिवस की कथा में व्यक्त करते हुए कहा की गीता के सम्बंध में प्रश्न पूछा जाता है कि गीता कौन सा योग समझाती है।
इस प्रश्न के कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्तियोग ऐसे विविध उत्तर है परंतु गीता इन तीनो से भिन्न ही एक योग समझाती है और वह है साधना योग यह गीता का चौथा योग है
अनंयेनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते
इसको गीता का अनन्य योग माना जाता है। जो कुछ करना है वह सब तेरे हाथ मे है। गीता व उपनिषद का यही कहना है वास्तव में सदा से आप मोक्ष में खड़े थे किंतु चाह के कारण से आप दूर दूर भटकते थे। इच्छा के कारण कहि और भटकते थे और मोक्ष यहीं है। परमात्मा है निकट और इच्छा है दूर अतः इच्छा व परमात्मा का मिलन नही हो पाता ईच्छा है दूर, परमात्मा है पास इच्छा है भविष्य में, और परमात्मा है वर्तमान में इच्छा है कल, परमात्मा है आज, ज्ञानी इच्छादि से मुक्त कर देते है कि ताकि जो निकट है निकटतम से भी निकट है वह जो परमात्मा है वह दिखाई पड़ जाए।
वास्तव में जो वासना से भरा है वह कही पहुंचना चाहता है कहीँ पहुंचने की इच्छा ही वासना है। हम जितने पंथों का निर्माण करते हैं वे सभी वासना के पँथ हैं, वासना से भरा हुआ चित जहां है, वहाँ वह कभी नही होता मैं नही है सदा वहीं डोलता रहता है । यह बड़ी असम्भव स्थिति है मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ नही होता और जहाँ नही होता हूं वहाँ सदा डोलता रहता हूँ।
अतः कहते हैं कि काम से भरा हुआ चित इच्छा से भरा हुआ चित जीवन की अटल गहराई का द्वार नहीँ खोल पाता वह मात्र परिधि से ही परिचित हो पाता है।
आज विशेष रूप से विजय कुमार शर्मा, स्वर्ण देवी शर्मा, लक्ष्मी बहुगुणा, सरस्वती रतुडी, मनोरमा डोभाल, मंजू बडोनी, माधुरी बहुगुणा, मीना सेमवाल, शुभम सेमवाल, सुजाता पाटनी, महासचिव गजेंद्र भण्डारी, कोषाध्यक्ष सन्तोष गैरोला, कैलाश तिवारी, प्रवीन ममगांई आदि की उपस्थिति रही।


