चिरबिटिया में सफेद हाथी साबित हो रहा 60 कुंतल क्षमता का कूलिंग सेंटर

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चिरबिटिया में सफेद हाथी साबित हो रहा 60 कुंतल क्षमता का कूलिंग सेंटर।



 संचालन को नहीं मिल रहे खरीदार। 


जखोली। स्थानीय नगदी फसलों के सुरक्षित भंडारण और किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने के उद्देश्य से उद्यान विभाग द्वारा विकासखंड जखोली के चिरबिटिया में निर्मित 60 कुंतल क्षमता का कूलिंग सेंटर आज विभागीय अदूरदर्शिता का उदाहरण बनकर रह गया है। टिहरी जनपद की सीमा से लगे फल पट्टी क्षेत्र में स्थित यह केंद्र पिछले लगभग तीन वर्षों से संचालन के अभाव में बंद पड़ा है और इसमें स्थापित लाखों रुपये की मशीनें अनुपयोगी बनी हुई हैं।

वर्तमान में इस कूलिंग सेंटर के संचालन के लिए कोई भी स्वयं सहायता समूह, सहकारी समिति, सीएलएफ अथवा स्थानीय किसान आगे आने को तैयार नहीं है। विभाग द्वारा निर्धारित ₹5,000 प्रतिमाह किराया, बिजली तथा रखरखाव का अतिरिक्त खर्च किसानों के लिए आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं माना जा रहा है।

स्थानीय काश्तकार गम्भीर सिंह, हरीश सिंह, आशीष सिंह तथा ओमप्रकाश कोठारी का कहना है कि क्षेत्र में मुख्य रूप से माल्टा का उत्पादन होता है, जबकि कीवी का उत्पादन अभी इतना अधिक नहीं है कि उसे लंबे समय तक कोल्ड स्टोरेज में रखने की आवश्यकता पड़े। वहीं, वर्षाकाल में उत्पादित आलू, गोभी और मटर जैसी बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन भी विभिन्न गांवों में बिखरा हुआ है। इन फसलों की मात्रा इतनी अधिक नहीं होती कि 60 कुंतल क्षमता वाले केंद्र का नियमित उपयोग हो सके।

 अधिकांश उपज बे मौसमी होने के कारण सीधे बाजार में अच्छे दामों में बिक जाती हैं, जिससे भंडारण की आवश्यकता सीमित रह जाती है।

ग्रामीणों का सुझाव है कि विभाग को इस केंद्र का संचालन पहले स्वयं अथवा किसी सक्षम एजेंसी के माध्यम से परीक्षण (ट्रायल) आधार पर करना चाहिए, ताकि एक वर्ष के वास्तविक संचालन व्यय, बिजली की खपत, रखरखाव लागत तथा संभावित आय का व्यावहारिक आकलन सामने आ सके। इसके बाद ही इसे किसानों या स्थानीय संस्थाओं को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया जाना चाहिए।

उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कुकसाल तथा विभिन्न कृषि अध्ययनों के अनुसार, पर्वतीय क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज की उपयोगिता तभी है जब उत्पादन अधिक हो बिना वास्तविक उत्पादन के आंकड़ों के कोल्ड स्टोरेज बनाना सरकारी धन का दुर्पयोग है। कोल्डस्टोरेज तभी सफल हो सकते हैं जब उन्हें क्लस्टर आधारित उत्पादन, संगठित विपणन व्यवस्था तथा मजबूत सप्लाई चेन से जोड़ा जाए।पहाड़ों में छोटी और बिखरी हुई जोतों के कारण एक स्थान पर पर्याप्त मात्रा में उपज एकत्र करना चुनौतीपूर्ण होता है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े आईआरडी फाउंडेशन  डायरेक्टर विजयपाल सिंह नेगी का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े कोल्ड स्टोरेज की अपेक्षा खेतों के निकट स्थापित छोटे माइक्रो प्री-कूलिंग चैंबर अधिक उपयोगी और आर्थिक रूप से व्यवहारिक सिद्ध हो सकते हैं। साथ ही, जब तक किसी क्षेत्र में सेब, कीवी जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों का पर्याप्त उत्पादन, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और प्रभावी विपणन तंत्र विकसित नहीं होता, तब तक बड़े निवेश से बने ऐसे केंद्र अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते और वित्तीय बोझ बन जाते हैं। चिरबिटिया का कूलिंग सेंटर इसी चुनौती का एक उदाहरण बनकर सामने आया है। 

जिला उद्यान अधिकारी रुद्रपयाग राजेश प्रसाद जसोला  ने कहा कि पूर्व में भी दो बार इस सेंटर के सञ्चालन हेतु विज्ञप्तियां जारी की गई थी जिसमें कोई किसान या समूह/सहकरिताएँ नही आई। फिर से विज्ञप्ति जारी की जा रही है।

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