अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस “1 मई”

मजदूर दिवस का इतिहास
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  अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस “1 मई”- International Worker's Day "1 May".

मिट्टी के माधवरुप, पत्थरों पर लकीर बनाने वाले तपस्वी, वे  कर्मयोगी  जो पत्थर के गारे नही अपने शरीर को गारा बनाते हैं ।

श्रमेव जयते का उद्घोष यही प्रदर्शित करता है कि श्रम से हर वस्तु अथवा लक्ष्य प्राप्य है। संसार में कोई भी कार्य करना हो उस हेतु श्रम की आवश्यकता है। कुछ हम स्वयं करते हैं जैसे अध्ययन, भोजन, लेखन आदि कार्य और कुछ कार्यों को दूसरों से करवाते हैं जोकि अपनी श्रमशक्ति से उस कार्य को सम्पन्न कर उसके प्रतिफल में कुछ उपार्जन करते हैं। अर्थात् सरल भाषा में कहें तो अपनी आजिविकोपार्जन हेतु श्रम के द्वारा दूसरों के कार्य एक प्रतिफल (धन या अन्यरुपों में) हेतु करने वाले व्यक्ति श्रमिक कहलाते हैं। अथवा ‍युगों युगों से अपने खून का पसीना बनाकर अपनी परवाह न करके हर मौसम में तत्पर, मात्र दो समय की रोटी  की लालसा रखते हुए हर सुबह अपने कर्म पथ पर अग्रसर, मिट्टी के माधवरुप, पत्थरों पर लकीर बनाने वाले तपस्वी, वे  कर्मयोगी  जो पत्थर के गारे नही अपने शरीर को गारा बनाते हैं श्रमिक कहलाते हैं। सहस्राधिक वर्षों से सम्मान की लालसा पाले यह वर्ग समाज में सिर्फ तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है। अथवा  दया के पात्र समझे जाते हैं।  समाज की दृष्टि कभी ये नहीं देखती कि जिस स्तर पर वो है उसमें इसी श्रमिकवर्ग का योगदान है। 

किसी भी समाज या देश के विकास में श्रमिक उस विशाल भवन की नींव की तरह हैं जो उसकी भव्यता को चिरतंर बनाने के लिए जमीन के नीचे रहकर उसे वो मजबूती प्रदान करती है कि वो सदियों तक  अविचल खड़ा रहे, श्रमिक पर किसी भी देश का  विकास निर्भर करता है।  किसी समाज, देश, उद्योग, संस्था, व्यवसाय को खड़ा करने के लिये कामगारों (कर्मचारियों) अथवा श्रमिकों की विशेष भूमिका होती है। श्रमिक के परिश्रम का कोई मूल्य नहीं है। इनके द्वारा किये गए कार्यों के परिणाम से ही जीवन सुलभ व सुन्दर बन पाता है।

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श्रमिक संगठित अथवा अंसगठित दो प्रकार के क्षेत्रों में कार्य करते हैं। कुशल,अर्धकुशल अथवा अकुशल श्रेणियों में विभक्त श्रमिक किसी भी राष्ट्र की उन्नति के नींव के वे पत्थर हैं जो दृष्टिगोचर नहीं होते।

मजदूर दिवस का इतिहास 

श्रमिकों के कार्य, कार्यसमय एवं वेतन अथवा श्रमांश में एकरुपता न होने के कारण व 15 -15 घण्टों तक कार्य करवाने के विरोध स्वरुप अमेरिका में एक मई 1886  से एक आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। सम्पूर्ण अमेरिका में श्रमिक अपने हितों की रक्षा हेतु सड़कों पर उतर गए। श्रमिकों के इस आन्दोलन को समाप्त करने के लिए अमेरिकन पुलिस ने गोलियां चला दी जिसके  कारण शताधिक श्रमिक घायल हो गए व कई अपने अधिकारों के लिये लड़ते हुए दिवगंत हो गए। इसके पश्चात् ये आन्दोलन और भी तीव्रता के साथ चलता रहा और परिणामस्वरुप 1889 में समाजवादी सम्मेलन में 1 मई को श्रमिकों की हितों की रक्षा एवं उनके शोषण के विरुद्ध अन्तर्राष्टीय श्रमिक दिवस मनाने के प्रस्ताव रखा गया। श्रमिकों को शोषण से बचाने हेतु यह प्रस्ताव किया गया कि आठ घण्टों से अधिक कार्य न करवाया जाए एवं इस दिन अवकाश रखा जाए।

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धीरे धीरे यह आन्दोलन एक वटवृक्ष बनकर सम्पूर्ण विश्व में प्रसरित हो गया एवं श्रमिकों के हितार्थ अनेकों संगठन कार्य करने लग गए। फलस्वरुप कई देशों में नए नए श्रमकानून व श्रमनियमावलियां तथा श्रमिकों के हितार्थ अनेकों योजनाएं प्रारम्भ की गई ।

भारत में 1 मई 1923 चेन्नई में  श्रमिक दिवस को मनाने की परम्परा प्रारम्भ हुई। श्रमिक दिवस का लक्ष्य श्रमिक अधिकारों की रक्षा, शोषण का विरोध, श्रमिक हित में नई योजनाओं हेतु सरकारों से मांग व ऐसे नये नये कानूनों जोकि श्रमिक हित के हों के निर्माण करवाने हेतु प्रयत्न करना इत्यादि हैं। श्रमिक दिवस को मजदूर दिवस व श्रम दिवस के नाम से भी जाना जाता है।

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