रुद्रप्रयाग PWD की सुस्ती से चारधाम यात्रामार्ग स्यालसु में बना है खतरनाक।
तंग रास्तों और अधूरे पुश्तों ने बढ़ाई मुसीबत, सतनाखील और स्यालसु: विभाग की अनदेखी का जीवंत प्रमाण।
रुद्रप्रयाग। "जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंसी बजा रहा था"—यह कहावत आज जनपद रुद्रप्रयाग के लोकनिर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर बिल्कुल सटीक बैठती है। चारधाम यात्रा का आगाज होने को है, लेकिन गंगोत्री-यमुनोत्री से केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग 'घनसाली-मयाली-तिलवाड़ा' आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि सर्दियों का कीमती समय, जब संवेदनशील स्थानों पर सुधारात्मक कार्य किए जा सकते थे, हाथ से निकल चुका है।
घनसाली-मयाली मार्ग पहले से ही अपनी कम चौड़ाई के कारण यातायात के लिए चुनौती बना हुआ है। स्थानीय जनता और तीर्थयात्रियों की चौड़ीकरण की मांग तो लंबे समय से अनसुनी की ही जा रही है, लेकिन विभाग ने उन स्थानों की भी सुध नहीं ली जहां बरसात में पुश्ते टूट चुके हैं। सर्दियों के शांत मौसम में जहां मलबे की सफाई और गदेरों (बरसाती नालों) का उपचार होना चाहिए था, वहां सन्नाटा पसरा रहा। अब जब यात्रा सिर पर है, तब विभाग की नींद खुलती दिख रही है, जो कि 'वक्त निकल जाने के बाद हाथ-पांव मारने' जैसा है।
सतनाखील गांव के पास स्थित गदेरा बरसात के समय अपने विशाल कैचमेंट एरिया के कारण रौद्र रूप धारण कर लेता है। इसके ठोस समाधान के लिए विभाग के पास पर्याप्त समय था, लेकिन कोई जमीनी कार्रवाई नहीं दिखी।
वहीं, स्यालसु गदेरे से महज 100 मीटर पहले की स्थिति और भी भयावह है। सेमा जाने वाले मोटरमार्ग की खुदाई का मलबा सही तरीके से डंप न किए जाने के कारण यहाँ एक गहरी और खतरनाक खाई बन चुकी है। पिछले तीन वर्षों से यह स्थान नासूर बना हुआ है। विभाग ने यहाँ क्रेटवायर (Crate-wire) लगाकर सुरक्षा का काम तो शुरू किया, लेकिन उसे भी अधूरा छोड़ दिया गया है। वर्तमान में क्रेटवायर के पीछे मलबा भर चुका है और यह सड़क के लेवल से अभी भी 5 मीटर नीचे है। अधूरा काम छोड़ने से यह स्थान पहले से ज्यादा असुरक्षित हो गया है, क्योंकि अगली बारिश में यह सुरक्षा दीवार ही मलबे के दबाव में बह सकती है।
अधिशासी अभियंता इंद्रजीत बोस ने कहा कि स्यालसु की समस्या समाधान हेतु टेण्डर प्रक्रिया जारी है ।
जनता के बीच अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर समय रहते ठोस निर्माण कार्य क्यों नहीं किए गए? क्या लोकनिर्माण विभाग जानबूझकर इन संवेदनशील स्थानों को बरसात के भरोसे छोड़ रहा है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि समय पर पक्का काम न करने के पीछे की मंशा मानसून के दौरान 'जेसीबी ठेकेदारों' को लाभ पहुँचाना हो सकती है, ताकि आपदा के नाम पर मलबे की सफाई के भारी-भरकम बिल भुनाए जा सकें।
चारधाम यात्रा के सुगम संचालन का दावा करने वाला प्रशासन क्या इन "सफेद हाथियों" पर नकेल कसेगा या फिर इस बार भी यात्रियों और स्थानीय लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर इन जानलेवा रास्तों से गुजरना होगा?


