सीमित दायरे में तीन-तीन गुलदार: जखोली में बढ़ता 'संघर्ष' और कैरिंग कैपेसिटी का बिगड़ता संतुलन।
कुनियाली गावं में एक साथ तीन गुलदारों का दिखना फिर से पुराने घावों का हरा होना ।
रुद्रप्रयाग जनपद का जखोली ब्लॉक इन दिनों किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं है, जहाँ ग्रामीण और वन्यजीवों के बीच का संघर्ष अब जानलेवा मोड़ ले चुका है। बीती रात कुनियाली गांव में एक साथ तीन गुलदारों के दिखने से न केवल ग्रामीणों में दहशत है, बल्कि यह वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए भी खतरे की घंटी है। एक छोटे से क्षेत्र में इतने अधिक शिकारियों की मौजूदगी सीधे तौर पर 'इकोलॉजिकल कैरिंग कैपेसिटी' (पारिस्थितिकी वहन क्षमता) के गंभीर असंतुलन की ओर इशारा कर रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक नर गुलदार को औसतन 20 से 30 वर्ग किलोमीटर का अपना क्षेत्र (Territory) चाहिए होता है। लेकिन जखोली के दक्षिणी रेंज में भूगोल और आबादी का गणित बिगड़ चुका है। खरियाल, देवल, मयाली और लम्बवाड जैसे गांव, जो महज 1 से 2 किलोमीटर की परिधि में बसे हैं, वहां 2024-2025 में लगातार हुए मानव पर हमले हुए तो कई सवाल खड़े हुए। जब एक ही छोटे भौगोलिक क्षेत्र में गुलदारों की संख्या उनकी प्राकृतिक वहन क्षमता से अधिक हो जाती है, तो उनके बीच आपसी संघर्ष बढ़ता है और कमजोर या युवा गुलदार आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं। कुनियाली में तीन गुलदारों का एक साथ दिखना इस बात का प्रमाण है कि जंगलों में उनके लिए जगह कम पड़ रही है ओर कुनियाली गावँ से 2 किलोमीटर की दूरी पर डांडा गावँ में रूपा देवी को 30 मई 2025 को गुलदार को मारा गया था। इस घटना से लोगों में गुलदार का ख़ौफ़ कैसे होता है यह सभी अवगत हैं।
15 माह का खूनी रिपोर्ट कार्ड
पिछले 15 महीनों के आंकड़े किसी भी सभ्य समाज को डराने के लिए काफी हैं। फरवरी 2024 से मई 2025 के बीच जखोली ने 11 बड़े हमले झेले हैं, जिनमें 3 महिलाओं (श्रीमती रूपा देवी, सर्वश्वरी देवी और दीपा देवी) को अपनी जान गंवानी पड़ी। हमलों की आवृत्ति इतनी अधिक है कि ग्रामीण अब खुद को 'डेथ जोन' में महसूस कर रहे हैं।
जखोली रेंज में हुए प्रमुख हमले:
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तिथि |
पीड़ित का नाम |
ग्राम/स्थान |
स्थिति |
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10 जून 2025 |
श्रीमती रामेश्वरी देवी |
मखेत |
हमला |
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30 मई 2025 |
श्रीमती रूपा देवी |
डांडा |
मृत्यु |
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25 फर. 2025 |
श्रीमती सर्वश्वरी देवी |
देवल |
मृत्यु |
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06 दिस. 2024 |
श्रीमती ललिता देवी |
मयाली |
हमला |
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31 अक्टू. 2024 |
बसंती देवी |
खरियाल |
हमला |
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13 अक्टू. 2024 |
श्रीमती उर्मिला देवी |
जयंती |
हमला |
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10 अक्टू. 2024 |
श्रीमती रैजा देवी |
ललूड़ी |
हमला |
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31 जुलाई 2024 |
अनीश सिंह |
ढुमकी |
हमला |
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24 फर. 2024 |
श्रीमती दीपा देवी |
मखेत |
हमला |
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21 फर. 2024 |
श्रीमती गीता देवी |
मयाली |
हमला |
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20 फर. 2024 |
कार्तिक सिंह |
महरगांव |
ग्रामीणों का तर्क वाजिब है कि गुलदार ने अब जंगलों के बजाय गांवों की झाड़ियों और खंडहरों को अपना 'स्थायी ठिकाना' बना लिया है। मयाली, ललूड़ी और ढुमकी जैसे गांवों की निकटता के कारण गुलदार एक गांव में हमला कर आसानी से दूसरे गांव के सुरक्षित क्षेत्र में ओझल हो जाता है। वीरू पँवार और रघुनाथ राणा जैसे ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन केवल मुआवजा बांटकर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकता; अब समय है कि इन गुलदारों को यहाँ से शिफ्ट किया जाए।
वन विभाग को अब पारंपरिक गश्त से आगे बढ़कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। क्षेत्र में गुलदारों की सटीक गणना (Density mapping) कर यह पता लगाना आवश्यक है कि क्या इस बेल्ट में गुलदारों की संख्या उनकी 'कैरिंग कैपेसिटी' को पार कर चुकी है। यदि ऐसा है, तो 'प्रॉब्लम एनिमल्स' को चिन्हित कर उन्हें उच्च हिमालयी क्षेत्रों या रेस्क्यू सेंटर्स में स्थानांतरित करना ही एकमात्र स्थायी समाधान है।
फिलहाल कुनियाली, डांडा चमसारी और नन्दवाण के लोग शाम ढलते ही घरों में कैद हैं। उनके लिए सूरज ढलने का मतलब है—खौफ की शुरुआत।


