घोलतीर-कोठगी पुल विवाद ने पकड़ा तूल

घोलतीर कोठगी पुल 18 वर्ष से अधर में,
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पहाड़ में अधर में लटकी योजनाएं: घोलतीर-कोठगी पुल विवाद ने पकड़ा तूल, ग्रामीणों ने दी आर-पार की जंग की चेतावनी।

रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में विकास योजनाओं का कछुआ गति से चलना और सरकारी फाइलों में बजट का 'खर्च' हो जाना नई बात नहीं है, लेकिन रुद्रप्रयाग जनपद का घोलतीर-कोठगी मोटर पुल अब ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ रहा है। लगभग 18 वर्षों से लंबित इस पुल निर्माण और सर्वे के स्थान में अचानक किए गए बदलाव ने दर्जनों गांवों की जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। सोमवार को ग्राम पंचायत कोठगी, भटवाड़ी और मडौला के ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर दो टूक चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर गौर नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन को विवश होंगे।

ग्रामीणों का आक्रोश केवल देरी को लेकर नहीं, बल्कि कार्यप्रणाली पर भी है। आरोप है कि जिस पुल के लिए वर्ष 2008 में ₹284 लाख की भारी-भरकम राशि स्वीकृत हुई थी, उस पर 2022 तक ₹44.51 लाख खर्च भी दिखाए जा चुके हैं। विडंबना यह है कि धरातल पर आज भी पुल का नामोनिशान नहीं है। यह स्थिति पहाड़ की उन तमाम योजनाओं की कहानी कहती है जहाँ बजट तो ठिकाने लग जाता है, लेकिन जनता की सुविधा वहीं की वहीं अटकी रहती है।

मामले में नया मोड़ सर्वे के स्थान को लेकर आया है। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग अब पूर्व में स्वीकृत स्थान को बदलकर नए स्थान पर सर्वे कर रहा है। अधिशासी अभियंता पर मनमानी का आरोप लगाते हुए ग्रामीणों ने कहा कि जनता के प्रस्ताव को दरकिनार कर लिया गया निर्णय किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा। पुराने सर्वे को बदलकर नए सिरे से कसरत करना न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग की ओर भी इशारा करता है।

पूर्व प्रधान हरेंद्र सिंह, संदीप राणा और रवींद्र सिंह सहित कई ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यदि 13 मार्च 2026 तक स्थिति स्पष्ट कर पुराने सर्वे के आधार पर काम शुरू नहीं किया गया, तो वे घोलतीर झूला पुल के पास आमरण अनशन और चक्का जाम करेंगे। पहाड़ की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में एक पुल मात्र कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों लोगों की लाइफलाइन होता है। इस विवाद ने एक बार फिर शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।


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