नन्दादेवी राजजात- इसी वर्ष होगी 'हिमालय का महाकुंभ'

नन्दा देवी राजजात 2026 के लिए महापंचायत,
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नंदा राजजात 2026: विवादों के बीच महापंचायत का बड़ा फैसला।

इसी वर्ष होगी 'हिमालय का महाकुंभ' यात्रा वसंत पंचमी पर निकलेगा यात्रा का मुहूर्त।

चमोली: उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान, 'हिमालय के महाकुंभ' के नाम से प्रसिद्ध नंदा राजजात यात्रा को लेकर चल रहा संशय अब समाप्त होता दिख रहा है। रविवार को श्रीनंदा राजजात समिति नौटी द्वारा यात्रा स्थगित करने के फैसले के बाद उपजे विवाद के बीच आज नंदा नगर ब्लॉक सभागार में 484 गांवों की महापंचायत बुलाई गई। इस महापंचायत में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि माँ नंदा की बड़ी जात इसी वर्ष (2026) आयोजित की जाएगी। बैठक में 'माँ नंदा देवी सिद्धपीठ मंदिर कुरुड़ आयोजन समिति' का गठन किया गया और कर्नल (सेवानिवृत्त) हरेंद्र सिंह रावत को निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया।

समिति ने स्पष्ट किया है कि आगामी 23 जनवरी को वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर राजजात का विधिवत मुहूर्त निकाला जाएगा। महापंचायत में मौजूद ग्रामीणों और प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि यात्रा को भव्य रूप से संचालित किया जाएगा। गौरतलब है कि इससे पूर्व नौटी समिति ने सितंबर में बर्फबारी की आशंका, मलमास के कारण देरी और ढांचागत सुविधाओं के अभाव का हवाला देते हुए यात्रा टालने का ऐलान किया था, जिससे श्रद्धालुओं में भारी आक्रोश था। अब नई समिति के गठन और महापंचायत के निर्णय के बाद यात्रा की तैयारियों ने दोबारा जोर पकड़ लिया है।

नंदा राजजात विश्व की सबसे कठिन धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है, जो हर 12 साल में एक बार आयोजित होती है। लगभग 280 किमी की यह पैदल यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं के मिलन का प्रतीक है। इस यात्रा का सबसे रहस्यमयी आकर्षण चार सींगों वाला भेड़ (चौसिंग्या खाडू) होता है, जो पूरी यात्रा का नेतृत्व करता है। मान्यता है कि यह खाडू 12 वर्ष में केवल एक बार जन्म लेता है। 19 से 22 दिनों तक चलने वाली यह यात्रा कठिन हिमालयी रास्तों से होते हुए होमकुंड पहुँचती है, जहाँ पूजा-अर्चना के बाद खाडू रहस्यमय तरीके से कैलाश की ओर ओझल हो जाता है।

क्यों खड़ा हुआ था विवाद?

विवाद की मुख्य वजह नौटी समिति का वह फैसला था जिसमें उन्होंने प्रशासन के पुनर्विचार पत्र और सुरक्षा कारणों को आधार बनाकर यात्रा स्थगित की थी। तर्क दिया गया था कि मई-जून में मलमास होने के कारण यात्रा सितंबर के अंत तक खिंच जाएगी, जिससे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, कुरुड़ आयोजन समिति और 484 गांवों के लोगों ने इस तर्क को दरकिनार करते हुए परंपरा की निरंतरता और जनभावनाओं को सर्वोपरि रखा है। अब सभी की नजरें वसंत पंचमी पर टिक गई हैं, जब इस पावन यात्रा की अंतिम तिथियों की घोषणा होगी।


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