उत्तराखंड में 10 साल से फंसा 'राजपूत सोनार' जाति प्रमाण पत्र विवाद

'राजपूत सोनार' जाति प्रमाण पत्र विवाद,
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उत्तराखंड में 10 साल से फंसा 'राजपूत सोनार' जाति प्रमाण पत्र विवाद: ओबीसी दर्जा होने के बावजूद प्रमाण पत्र जारी करने पर रोक।

वर्षों से प्रमाण पत्र पा रहे 'राजपूत सोनार' अचानक हुए OBC सूची से बाहर; चुनाव में परिणाम भुगतने की चेतावनी।






देहरादून/रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड में 'राजपूत सोनार' जाति के लोगों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत जाति प्रमाण पत्र जारी किए जाने का मामला पिछले 10 वर्षों से अधर में लटका हुआ है। सरकार द्वारा वर्ष 2014 में अचानक प्रमाण पत्र जारी करना बंद कर दिए जाने के कारण इस समुदाय के लोगों में गहरा असंतोष है। यह पूरा मामला न सिर्फ रुद्रप्रयाग बल्कि पूरे उत्तराखंड से जुड़ा हुआ है।

प्रमाण पत्रों का अचानक बंद होना: क्या है 'साजिश'

उपलब्ध दस्तावेजों और जानकारी के अनुसार, राजपूत सोनार जाति के परिवारों को पूर्व में तहसीलदार स्तर से जाति प्रमाण पत्र जारी किए जाते रहे थे। ये प्रमाण पत्र 1947 से बनाए जा रहे थे और इनके आधार पर उत्तर प्रदेश के समय में कई लोगों ने सरकारी, यहाँ तक कि शिक्षक की, नौकरी भी प्राप्त की थी।

लेकिन, वर्ष 2014 में शासन-प्रशासन ने अचानक ये प्रमाण पत्र यह कहते हुए बंद कर दिए कि 'राजपूत सोनार' ओबीसी जाति के अंतर्गत नहीं आते हैं। इस अचानक लिए गए फैसले को समुदाय के नेताओं ने शासन-प्रशासन की एक बड़ी साजिश का हिस्सा बताया है।

केवल 'सोनार' अंकित परिवारों को लाभ

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह रोक मनमानी है, क्योंकि जिन परिवारों के बंदोबस्ती रिकॉर्ड (Bandobasti Records) में केवल 'सोनार' या 'सुनार' अंकित है, उनके प्रमाण पत्र आज भी बनाए जा रहे हैं। जबकि, बंदोबस्ती में 'कोम राजपूत सोनार' दर्ज परिवारों के जाति प्रमाण पत्र रोक दिए गए हैं, रुद्रप्रयाग के एक उप-चुनाव के संदर्भ में स्पष्ट होता है, जहाँ उम्मीदवार नीलम देवी के प्रमाण पत्र पर विवाद खड़ा हुआ है।

आयोग और सरकार की सुस्ती

राजपूत सोनार समुदाय ने जाति प्रमाण पत्र पुनः जारी करवाने के लिए वर्ष 2016 में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग में भी पत्र दिया था। आयोग ने इस मामले पर सुनवाई की और उत्तराखंड के 13 जिलों की आर्थिक एवं सामाजिक सर्वेक्षण रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी।

आयोग के अध्यक्ष और सचिव ने भी माना कि यह प्रकरण सचिव, समाज कल्याण को आवश्यक कार्यवाही के लिए भेजा गया है। इसके बाद, समाज कल्याण अनुभाग-2 ने जुलाई 2021 में देहरादून, हरिद्वार, उत्तरकाशी, टिहरी और उधमसिंह नगर के जिलाधिकारियों से इस संबंध में स्पष्ट मंतव्य और संस्तुति सहित प्रस्ताव माँगा था।

लेकिन, 10 साल बीत जाने के बावजूद भी यह मामला जस का तस पड़ा हुआ है।

ओबीसी सूची में संशोधन का प्रस्ताव

 दस्तावेजों के अनुसार, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस विवाद को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार को उत्तराखंड अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की पुनर्विशोधित अनुसूची-1 में संशोधन करने का प्रस्ताव भेजा है।

इस प्रस्तावित संशोधन में मूल जाति 'सोनार, सुनार, स्वर्णकार' की उपजातियों के कॉलम में 'राजपूत सोनार' को भी शामिल करने की संस्तुति की गई है ताकि प्रमाण पत्र जारी करने की विसंगति समाप्त हो सके।

नेताओं की चेतावनी: 2027 चुनाव में भुगतना पड़ेगा खामियाजा

त्यूँखर के पूर्व ज्येष्ठ उप प्रमुख चैन सिंह पंवार, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य श्रीमती लौंगा देवी पंवार, गंभीर सिंह पंवार और पद्म सिंह पंवार सहित समुदाय के अन्य लोगों ने सरकार की निष्क्रियता पर कड़ा रोष व्यक्त किया है।

उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार इतने सालों में उचित कार्यवाही न करके अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों के साथ छलावा कर रही है और जानबूझकर लोगों को दिग्भ्रमित कर रही है। नेताओं ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने इस ओर कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की, तो इसका खामियाजा उसे 2027 के विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा।


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