जर्जर भवन में भविष्य गढ़ने को मजबूर छात्र ।
क्या सरकार जानबूझकर कमजोर कर रही है प्राथमिक शिक्षा की नींव?
रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। ताजा मामला प्राथमिक विद्यालय सौंदा का है, जहाँ तीन ग्राम सभाओं सौंदा, मौसड और माथगाँव के बच्चे पढ़ने आते हैं। लेकिन विद्यालय की स्थिति ऐसी है कि यहाँ 'ज्ञान के मंदिर' से ज्यादा 'खतरे का साया' मंडरा रहा है। लगभग 30 वर्ष पुराने इस विद्यालय भवन की छत बरसात में छलनी हो जाती है और कमरों के भीतर पानी का सैलाब उमड़ पड़ता है। दीवारें इस कदर जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं कि वे कभी भी किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती हैं।
ग्राम प्रधान श्रीमती संग्रादी देवी और क्षेत्र पंचायत सदस्य नीलम कपरवाण का कहना है कि शिक्षा विभाग को कई बार इस गंभीर स्थिति से अवगत कराया गया, लेकिन विभाग कुंभकर्णी नींद सोया हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार एक तरफ 'शिक्षा की गुणवत्ता' सुधारने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं (अवस्थापना) के अभाव में रुद्रप्रयाग के कई विद्यालय पहले ही बंद हो चुके हैं। ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा— "पहले आसन शुद्ध, फिर मंत्र शुद्ध", लेकिन यहाँ तो छात्रों के बैठने के लिए सुरक्षित स्थान तक नहीं है।
स्थानीय निवासी विक्रम सिंह, रघुवीर लाल, बद्री भट्ट और अन्य ग्रामीणों ने चिंता व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकार जानबूझकर प्राथमिक शिक्षा की नींव को कमजोर कर रही है? पहाड़ में लगातार कम होती छात्र संख्या का मुख्य कारण यही जर्जर भवन और सुविधाओं का अभाव है। आलम यह है कि कक्षा 1 से 5 तक की जिम्मेदारी अक्सर एकल शिक्षकों के भरोसे छोड़ दी जाती है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि बिना सुरक्षित भवन और पर्याप्त संसाधनों के 'डिजिटल इंडिया' और 'शिक्षित उत्तराखंड' का सपना कैसे साकार होगा?
सुमीत, दीप प्रकाश भट्ट, उदय सिंह, माधो सिंह, कमल सिंह, प्रमोद, राजेश, आशा, हयात सिंह, दौलत राम, स्वयंबर और उमेद सिंह सहित समस्त क्षेत्रवासियों ने विभाग से तत्काल विद्यालय भवन के पुनर्निर्माण की मांग की है, ताकि बच्चों का भविष्य और जीवन सुरक्षित रह सके।


